ऊर्ध्व और क्षैतिज आरक्षण पर विशेष जोर
प्रदेश सरकार ने स्पष्ट किया है कि पहले से लागू शासनादेशों के अनुसार सभी सेवाओं में ऊर्ध्व (वर्टिकल) और क्षैतिज (हारिजेंटल) आरक्षण की व्यवस्था प्रभावी है। इसका अर्थ यह है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग जैसे वर्गों के साथ-साथ दिव्यांग, पूर्व सैनिक और महिला उम्मीदवारों के लिए तय आरक्षण का सही तरीके से समायोजन अनिवार्य होगा। सरकार का कहना है कि अक्सर भर्ती प्रक्रिया में इन दोनों प्रकार के आरक्षण की गणना में तकनीकी या प्रशासनिक त्रुटियां सामने आती हैं, जिससे विवाद की स्थिति बनती है। अब ऐसी गलतियों को पहले ही चरण में रोकने पर जोर दिया जाएगा।
भर्ती प्रस्तावों की होगी दोबारा जांच
प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक द्वारा जारी शासनादेश के तहत उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग, उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग और अन्य सभी चयन बोर्डों को भेजे जाने वाले भर्ती प्रस्तावों की गहन समीक्षा की जाएगी। इस समीक्षा में खास तौर पर आरक्षण से जुड़ी रिक्तियों की गणना को दोबारा परखा जाएगा। यदि किसी भी स्तर पर विसंगति पाई जाती है, तो उसे संबंधित आयोग या चयन संस्था के माध्यम से दुरुस्त कराया जाएगा।
कमियां दूर होने के बाद ही आगे बढ़ेगी प्रक्रिया
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि जब तक आरक्षण से संबंधित सभी कमियों का समाधान नहीं हो जाता, तब तक किसी भी भर्ती प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी नहीं दी जाएगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुरूप हो। इस फैसले से न केवल कानूनी विवादों में कमी आने की उम्मीद है, बल्कि योग्य उम्मीदवारों को उनका संवैधानिक अधिकार भी समय पर मिल सकेगा।
उम्मीदवारों और संस्थाओं के लिए क्या मायने?
इस सख्ती का असर सीधे तौर पर भर्ती प्रक्रिया से जुड़े सभी पक्षों पर पड़ेगा। चयन संस्थाओं को अब पहले से अधिक सतर्क रहना होगा, वहीं उम्मीदवारों को यह भरोसा मिलेगा कि आरक्षण नियमों के साथ किसी तरह की अनदेखी नहीं होगी। सरकार का मानना है कि यह कदम भर्ती प्रणाली में भरोसा बढ़ाने और सामाजिक न्याय के सिद्धांत को मजबूत करने की दिशा में अहम साबित होगा।
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