मोबाइल फोन से लेकर ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स तक, भारत धीरे-धीरे एक बड़े उत्पादन केंद्र के रूप में उभर रहा है। यही वजह है कि 2026 को लेकर एक बड़ा सवाल हर जगह चर्चा में है की क्या भारत अब चीन जैसी मैन्युफैक्चरिंग ताकत बनने की दिशा में निर्णायक कदम रखने वाला है?
भारत का अपना रास्ता
चीन ने सस्ते श्रम और बड़े पैमाने पर सरकारी सब्सिडी के सहारे दुनिया की फैक्ट्री बनने का सफर तय किया। लेकिन अब भारत धीरे-धीरे उत्पादन की अहम कड़ियों में शामिल हो रहा है। विदेशी कंपनियां भारत को लंबे समय के निवेश के रूप में देखने लगी हैं, जो इस बदलाव का साफ संकेत है।
असेंबली से आगे बढ़ने की चुनौती
असल परीक्षा तब होगी जब भारत सिर्फ तैयार उत्पाद बनाने से आगे बढ़कर उनके जरूरी पुर्जे भी खुद बनाने लगेगा। मोबाइल, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले कंपोनेंट अगर देश में बनने लगते हैं, तो यह भारत के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है। यही वह मोड़ होगा जहां भारत वैश्विक सप्लाई चेन में एक अहम खिलाड़ी बन सकेगा।
चिप और बैटरी: भविष्य की कुंजी
सेमीकंडक्टर और बैटरी मैन्युफैक्चरिंग आने वाले समय की रीढ़ मानी जा रही है। चिप्स की वैश्विक कमी ने यह साफ कर दिया है कि तकनीकी आत्मनिर्भरता कितनी जरूरी है। भारत का लक्ष्य सिर्फ फैक्ट्री लगाना नहीं, बल्कि एक पूरा इकोसिस्टम खड़ा करना है जहां डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और उपयोग तीनों एक-दूसरे से जुड़े हों। इसी तरह, इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा के दौर में बैटरी और दुर्लभ खनिजों की प्रोसेसिंग भी भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखती है। इन क्षेत्रों में मजबूती चीन पर निर्भरता को कम कर सकती है।
अब वैश्विक मौका भारत के हाथ
दुनिया अब चीन पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहती। इसी तलाश में भारत एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभर रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते, मजबूत कूटनीति और बढ़ता निवेश भारत के पक्ष में माहौल बना रहे हैं। संभव है कि 2026 में भारत अपनी गति से एक आत्मनिर्भर और प्रभावशाली मैन्युफैक्चरिंग पावरहाउस के रूप में दुनिया के सामने खड़ा हो।
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