भारत-रूस-चीन एक साथ, अमेरिका की बजेगी बैंड!

नई दिल्ली। 1 जनवरी 2026 से भारत ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता संभालने जा रहा है, ऐसे समय में जब अमेरिका के कुछ कदम अनजाने में भारत, रूस और चीन को और करीब ला रहे हैं। इससे यह अंतर-सरकारी संगठन पहले से कहीं अधिक महत्व रखता है। अमेरिकी राजनीति और व्यापारिक दबावों के बावजूद ब्रिक्स देशों ने अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करना जारी रखा है, जिससे वैश्विक भू-राजनीति में बड़ा बदलाव होने की संभावना है।

ब्रिक्स की ताकत और वैश्विक प्रभाव

तेल उत्पादन में दबदबा: ब्रिक्स देशों ने 2024 में विश्व के लगभग 42 प्रतिशत कच्चे तेल का उत्पादन किया। यह संख्या उन्हें वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक मजबूत negotiating पॉवर देती है।

सोने का भंडार: चीन और रूस मिलकर केंद्रीय बैंकों के पास मौजूद वैश्विक स्वर्ण भंडार का 14 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते हैं। कुल मिलाकर ब्रिक्स देशों के पास दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत सोना है, और भारत इसमें बढ़ता हुआ योगदान देता दिख रहा है।

अर्थव्यवस्था में योगदान: विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में ब्रिक्स देशों ने वैश्विक GDP का लगभग 29 प्रतिशत योगदान दिया। चीन, भारत, ब्राजील और रूस की अर्थव्यवस्थाएं विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं।

भारतीय पहल: रुपये में व्यापार

अगस्त 2025 में भारत ने ब्रिक्स देशों को अपने व्यापार के लिए भारतीय रुपये का इस्तेमाल करने की अनुमति दी, जिससे अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व कम हो सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को निर्देश दिया कि वे विदेशी निर्यातक और आयातक के लिए विशेष वोस्त्रो खाते खोलें। यह कदम अमेरिका के वित्तीय प्रभुत्व के लिए एक चुनौती पेश करता है।

भारत-रूस तेल व्यापार

अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत और रूस के बीच कच्चे तेल का व्यापार स्थिर बना हुआ है। दिसंबर 2025 में भारत ने रूस से रोजाना 10 लाख बैरल तेल का आयात किया। यह संख्या उम्मीदों के विपरीत कम नहीं हुई, जिससे यह संकेत मिलता है कि दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध मजबूती से कायम हैं।

अमेरिका के लिए चुनौती

ब्रिक्स देशों की संयुक्त ताकत, तेल, सोना, वैश्विक GDP में हिस्सेदारी और डॉलर से स्वतंत्र भुगतान प्रणाली अमेरिका के वैश्विक प्रभुत्व के लिए चुनौती पेश करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि 2026 में ब्रिक्स देशों की भूमिका और प्रभाव बढ़ेगा, जिससे अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पकड़ बनाए रखने में कठिनाई होगी।

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