भारत- रूस की बड़ी तैयारी, अमेरिका हैरान, चीन सन्न!

नई दिल्ली। भारत की सुरक्षा और निगरानी क्षमता को नई ऊंचाई पर ले जाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठने जा रहा है। भारत और रूस मिलकर एक ऐसे मल्टी-रोल टर्बोप्रॉप विमान के संयुक्त निर्माण की तैयारी में हैं, जो सिर्फ यात्री या कार्गो परिवहन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में समुद्र और सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभा सकता है। IL-114-300 नाम का यह विमान भारत की सामरिक जरूरतों के हिसाब से एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर रहा है।

मोदी–पुतिन मुलाकात के बाद मिली रफ्तार

दिसंबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात के बाद इस परियोजना को नई गति मिली। इसके बाद हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (UAC) के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए। रूस की सरकारी कंपनी ROSTEC इस प्रोजेक्ट की तकनीकी, आर्थिक और सर्टिफिकेशन से जुड़ी व्यवहार्यता पर काम कर रही है। रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत–रूस रणनीतिक साझेदारी का अगला बड़ा पड़ाव मान रहे हैं।

दोनों देशों के हित क्यों जुड़े

रूस अपने पुराने An-24 और An-26 विमानों को बदलने के विकल्प तलाश रहा है, जबकि भारत “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के तहत एविएशन सेक्टर में विदेशी निर्भरता कम करना चाहता है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद रूस का झुकाव एशियाई साझेदारों की ओर बढ़ा है और भारत उसके लिए एक भरोसेमंद सहयोगी बनकर उभरा है। भारत को भी ATR जैसे आयातित विमानों के मुकाबले एक किफायती और सामरिक विकल्प मिलने की उम्मीद है।

भारत को क्या फायदा?

HAL और UAC के बीच हुए समझौते के तहत भारत में स्थानीय उत्पादन लाइन स्थापित करने की संभावना है, जिसे बेंगलुरु या नासिक जैसे शहरों में लगाया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर खास जोर दिया गया है, ताकि कंपोजिट मटीरियल, डिजिटल फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम और एडवांस एवियोनिक्स जैसे अहम हिस्से भारत में ही विकसित हो सकें। शुरुआती चरण में 40 से 50 प्रतिशत तक स्वदेशीकरण का लक्ष्य रखा गया है।

समुद्र में ‘उड़ता हुआ प्रहरी’

इस परियोजना का सबसे रणनीतिक पहलू इसका मैरीटाइम पेट्रोल और एंटी-सबमरीन वर्जन है। इस रूप में IL-114-300 में आधुनिक सर्च रडार, EO/IR सेंसर, सोनाबॉय और एंटी-सबमरीन हथियार लगाए जा सकते हैं। यह विमान भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ), समुद्री मार्गों, संदिग्ध जहाजों और दुश्मन पनडुब्बियों पर लगातार नजर रख सकेगा। कम लागत और लंबी उड़ान अवधि के कारण यह P-8I जैसे महंगे जेट विमानों के लिए एक प्रभावी सपोर्ट प्लेटफॉर्म बन सकता है।

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