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अमेरिका का बड़ा फैसला! 50 देशों के लिए वीजा बॉन्ड नियम लागू, भारत को मिली छूट

नई दिल्ली। अमेरिका ने बी-1 और बी-2 वीजा से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अमेरिकी विदेश विभाग की 2 अक्टूबर 2026 की अपडेटेड सूची के अनुसार 50 देशों के नागरिकों को अब वीजा बॉन्ड देना पड़ सकता है। बॉन्ड की रकम 10 हजार, 15 हजार या 20 हजार डॉलर तक हो सकती है। राहत की बात यह है कि इस सूची में भारत को शामिल नहीं किया गया है।

इस नियम का मकसद वीजा की तय अवधि खत्म होने के बाद अमेरिका में रुकने यानी ओवरस्टे के मामलों को कम करना है। संबंधित देशों के आवेदकों को इंटरव्यू के दौरान बताया जाएगा कि उन्हें कितनी राशि का बॉन्ड जमा करना है। निर्धारित शर्तों के तहत समय पर अमेरिका छोड़ने पर यह रकम वापस मिल सकती है।

ऑनलाइन जमा होगा बॉन्ड

बॉन्ड की प्रक्रिया के लिए अमेरिकी सरकार का निर्धारित फॉर्म और आधिकारिक ऑनलाइन भुगतान व्यवस्था इस्तेमाल करनी होगी। आवेदकों को किसी बाहरी वेबसाइट या अनधिकृत व्यक्ति के जरिए भुगतान करने से बचने की सलाह दी गई है। बॉन्ड तभी जमा करना होगा, जब कांसुलर अधिकारी इसकी आधिकारिक जानकारी दें।

भारत को मिली राहत

इस फैसले का भारतीय यात्रियों पर सीधा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि भारत 50 देशों की सूची में नहीं है। यानी भारतीय नागरिकों को बी-1 या बी-2 वीजा के लिए इस अतिरिक्त बॉन्ड की राशि जमा नहीं करनी होगी। हालांकि सामान्य वीजा नियम और अन्य पात्रता शर्तें पहले की तरह लागू रहेंगी।

इस सूची में भारत के पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश और भूटान के नाम शामिल हैं। ऐसे देशों के यात्रियों को अमेरिका जाने से पहले अतिरिक्त वित्तीय शर्त पूरी करनी होगी। नए नियम का मुख्य उद्देश्य वीजा शर्तों के पालन को सुनिश्चित करना और ओवरस्टे पर रोक लगाना है।

भारत-रूस के बीच बनेगा नया ट्रेड रूट! पुतिन ने दिया बड़ा प्रस्ताव

नई दिल्ली। दुनिया के कई अहम समुद्री मार्गों पर बढ़ते तनाव के बीच भारत और रूस के बीच व्यापारिक कनेक्टिविटी को मजबूत करने की दिशा में नई चर्चा सामने आई है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय ट्रांसपोर्ट और शिपिंग कॉरिडोर के इस्तेमाल को बढ़ाने की बात कही है। उनका कहना है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को केवल कारोबार तक सीमित न रखते हुए परिवहन नेटवर्क को भी मजबूत किया जा सकता है।

INSTC पर बढ़ रहा फोकस

इस योजना में इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) खास महत्व रखता है। यह मल्टीमॉडल नेटवर्क भारत को ईरान और रूस से जोड़ता है और इसमें समुद्री मार्ग के साथ रेल तथा सड़क नेटवर्क का भी इस्तेमाल होता है। इसका उद्देश्य यूरेशिया में माल ढुलाई को ज्यादा सुगम बनाना और पारंपरिक समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम करना है। भारत और रूस पहले भी इस कॉरिडोर के इस्तेमाल को बढ़ाने पर सहमति जता चुके हैं।

ईरान की भूमिका अहम

कॉरिडोर को पूरी क्षमता से विकसित करने में ईरान की भूमिका महत्वपूर्ण है, क्योंकि रूट का एक बड़ा हिस्सा उसके क्षेत्र से गुजरता है। रूस ने इससे जुड़े बुनियादी ढांचे को आगे बढ़ाने के लिए वित्तीय सहयोग की इच्छा जताई है। साथ ही, अजरबैजान से गुजरने वाले हिस्से में भी काम आगे बढ़ाने की बात सामने आई है।

भारत को क्या फायदा?

नए ट्रांसपोर्ट विकल्पों से भारत के लिए रूस और यूरेशिया के बाजारों तक पहुंच आसान हो सकती है। सामान की आवाजाही के लिए एक से ज्यादा रास्ते उपलब्ध होने से व्यापारिक जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है। भारत और रूस पहले ही INSTC, चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री कॉरिडोर और नॉर्दर्न सी रूट जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दे चुके हैं।

ऐसे में पुतिन का ताजा प्रस्ताव भारत-रूस व्यापार के लिए नई कनेक्टिविटी को लेकर महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। हालांकि, इसे पूरी तरह लागू करने के लिए संबंधित देशों के बीच बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और अन्य लंबित मुद्दों पर आगे काम करना होगा।

भारत की कंपनी अमेरिका में बनाएगी सबसे बड़ा स्टील प्लांट! ट्रंप ने किया ऐलान

नई दिल्ली। भारतीय उद्योग समूह Essar Group अमेरिका में एक बड़े स्टील प्रोजेक्ट पर करीब 18 अरब डॉलर निवेश करने जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में इसकी घोषणा की। Essar की अमेरिकी इकाई Mesabi Metallics Iowa में नया स्टील कॉम्प्लेक्स तैयार करेगी, जिसे अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े स्टील प्लांट के तौर पर पेश किया गया है।

सालाना 1 करोड़ टन तक होगा उत्पादन

प्रोजेक्ट में Iowa के स्टील कॉम्प्लेक्स पर करीब 15 अरब डॉलर खर्च होने हैं, जबकि Minnesota में आयरन-ओर माइन और उससे जुड़ी सुविधाओं पर लगभग 3 अरब डॉलर का निवेश शामिल है। प्लांट की शुरुआती क्षमता करीब 75 लाख टन सालाना होगी, जिसे आगे बढ़ाकर 1 करोड़ टन तक ले जाने की योजना है। उत्पादन की शुरुआत करीब 2030 में होने का लक्ष्य रखा गया है।

Minnesota से आएगा कच्चा माल

इस प्रोजेक्ट की खासियत इसका एकीकृत सप्लाई सिस्टम है। Minnesota की Mesabi Iron Range में कंपनी की आयरन-ओर परियोजना से कच्चा माल Iowa के स्टील कॉम्प्लेक्स तक पहुंचाया जाएगा। यानी खनन से लेकर स्टील उत्पादन तक पूरी प्रक्रिया अमेरिका में ही होगी।

हजारों रोजगार के अवसर

कंपनी के मुताबिक इस पूरे प्रोजेक्ट से निर्माण और संचालन के दौरान हजारों रोजगार के अवसर पैदा होंगे। शुरुआती 10 वर्षों में परियोजना के अमेरिकी अर्थव्यवस्था में करीब 95 अरब डॉलर के आर्थिक योगदान का अनुमान भी सामने आया है।

डॉलर को बड़ा झटका! भारत-UAE के इस कदम से अमेरिका तक हलचल, जानें पूरी खबर

नई दिल्ली। भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने दोनों देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में कारोबार को बढ़ावा देने की दिशा में अहम कदम उठाया है। भारत-UAE उच्चस्तरीय संयुक्त कार्यबल की बैठक में स्थानीय मुद्रा निपटान, भुगतान और मैसेजिंग सिस्टम के एकीकरण के साथ केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) से जुड़ी पहलों पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने इन व्यवस्थाओं को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने के लिए सहयोग करने पर सहमति जताई।

रुपये-दिरहम में कारोबार पर जोर

इस व्यवस्था का मकसद भारत और UAE के बीच व्यापार और निवेश को ज्यादा आसान और कुशल बनाना है। भारत और UAE के केंद्रीय बैंक स्थानीय मुद्रा में लेनदेन से जुड़ी व्यवस्था पर पहले से काम कर रहे हैं। सरकारी दस्तावेज के मुताबिक, दोनों देशों के बीच INR और AED में व्यापार तथा रेमिटेंस के निपटान की व्यवस्था मौजूद है।

बढ़ रहा भारत-UAE व्यापार

भारत और UAE के आर्थिक रिश्तों में लगातार विस्तार हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 101.25 अरब डॉलर तक पहुंच गया। बैठक में ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी, AI, लॉजिस्टिक्स, अंतरिक्ष, कृषि और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई।

स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ने से डॉलर पर निर्भरता कम करने और सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने की दिशा में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसे डॉलर के अंत या किसी एक देश के खिलाफ कदम के तौर पर नहीं, बल्कि भारत-UAE के बीच भुगतान और व्यापार व्यवस्था को मजबूत करने वाली पहल के रूप में देखना ज्यादा सटीक होगा।

रूस के विमान अब भारत में बनेंगे! 50 विमानों की बड़ी डील

नई दिल्ली। भारत के एविएशन सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। हाल ही में ओमकम एविएशन प्राइवेट लिमिटेड ने रूस की United Aircraft Corporation (UAC) के साथ 50 IL-114-300 यात्री विमानों को लेकर लेटर ऑफ इंटेंट (LOI) किया है। कंपनी की योजना रूस से विमान मंगाने के साथ-साथ आगे चलकर भारत में ही इनके निर्माण की व्यवस्था खड़ी करने की है।

योजना के शुरुआती चरण में 6 विमान रूस से भारत लाए जाएंगे। इसके बाद देश में इन विमानों की असेंबली शुरू करने के लिए उत्पादन लाइन विकसित करने और तकनीक को भारत लाने पर काम किया जाएगा। कंपनी ने इस परियोजना के पहले चरण में करीब 1,500 करोड़ रुपये के निवेश की योजना बताई है। भविष्य में परियोजना का विस्तार होने पर निवेश बढ़ सकता है।

छोटे शहरों के लिए उपयोगी हो सकता है विमान

IL-114-300 एक ट्विन-इंजन टर्बोप्रॉप विमान है, जिसमें करीब 66 से 68 यात्रियों के बैठने की क्षमता बताई जाती है। इसे क्षेत्रीय उड़ानों और अपेक्षाकृत छोटे रनवे वाले एयरपोर्ट के लिए डिजाइन किया गया है। भारत में क्षेत्रीय हवाई संपर्क बढ़ाने की कोशिशों के बीच ऐसे विमान छोटे शहरों को आपस में जोड़ने में उपयोगी हो सकते हैं। इससे टियर-2 और टियर-3 शहरों के बीच सीधी उड़ानों की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

धीरे-धीरे बढ़ेगा घरेलू निर्माण

इस परियोजना में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को अहम हिस्सा माना जा रहा है। शुरुआत में तैयार विमान भारत आएंगे, फिर असेंबली का काम शुरू करने और धीरे-धीरे ज्यादा पुर्जों का निर्माण देश में करने की योजना है। कंपनी का दीर्घकालिक लक्ष्य विमान के 100 फीसदी घरेलू निर्माण तक पहुंचना बताया गया है।

अगर योजना आगे बढ़ती है तो विमान निर्माण के साथ पार्ट्स, इंजीनियरिंग, रखरखाव और एविएशन सेवाओं से जुड़े कारोबार को भी नए अवसर मिल सकते हैं। केंद्र की ओर से भी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए ऐसे विमानों की उपयोगिता पर जोर दिया गया है।

भारत के समर्थन में खुलकर उतरा रूस, चीन सन्न, पाक के उड़े होश!

नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग को लेकर रूस ने एक बार फिर समर्थन जताया है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के दौरान एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। रूस भारत और ब्राजील की स्थायी सदस्यता की दावेदारी के समर्थन में है।

लावरोव ने पश्चिमी देशों के लिए नई स्थायी सीटें बढ़ाने पर आपत्ति जताते हुए जर्मनी और जापान के दावों का विरोध किया। वहीं, भारत की स्थायी सीट की मांग को हाल में कई अन्य देशों और समूहों से भी समर्थन मिला है। 22 सितंबर को G4 भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान ने भी UNSC में स्थायी और गैर-स्थायी दोनों तरह की सीटें बढ़ाने की मांग दोहराई।

UNSC में कितने सदस्य हैं?

आपको बता दें की वर्तमान समय में सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन पांच स्थायी सदस्य हैं और सभी के पास वीटो करने का अधिकार प्राप्त है। बाकी 10 सदस्य दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं।

सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन जरूरी होगा। इसके लिए महासभा में दो-तिहाई समर्थन के साथ सदस्य देशों की निर्धारित मंजूरी और मौजूदा पांचों स्थायी सदस्यों की स्वीकृति भी आवश्यक है। ऐसे में भारत की दावेदारी को समर्थन मिलने के बावजूद UNSC सुधार की प्रक्रिया अभी लंबी और जटिल बनी हुई है।

रूस में फिर चला पुतिन का सिक्का! संसदीय चुनाव में बड़ी जीत

नई दिल्ली। रूस के संसदीय चुनाव में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के समर्थन वाली यूनाइटेड रशिया पार्टी ने मजबूत बढ़त हासिल की है। रूसी न्यूज एजेंसी TASS के मुताबिक केंद्रीय निर्वाचन आयोग के आंकड़ों में पार्टी को 57.86 फीसदी वोट मिले हैं। अब तक 90.43 फीसदी मतों की गिनती पूरी हो चुकी है।

बाकी पार्टियों का प्रदर्शन

वोट प्रतिशत के मामले में दूसरे स्थान पर सीआरपीएफ को 13.84 फीसदी मत मिले हैं। वहीं एलडीपीआर को 8.9 फीसदी, न्यू पीपल को 7.94 फीसदी और ए जस्ट रशिया को 4.95 फीसदी वोट हासिल हुए हैं। यह चुनाव फरवरी 2022 में यूक्रेन के साथ शुरू हुए संघर्ष के बाद रूस में हुआ पहला संसदीय चुनाव है। पुतिन ने चुनाव के दौरान यूक्रेन में तैनात रूसी सैनिकों के समर्थन को भी मुद्दे से जोड़ा था।

क्या है स्टेट ड्यूमा?

रूस की संसद के निचले सदन को स्टेट ड्यूमा कहा जाता है, जिसकी तुलना भारत की लोकसभा से की जा सकती है। इसमें कुल 450 सीटें हैं। 225 सीटें पार्टी के वोट प्रतिशत के आधार पर और बाकी 225 सीटें अलग-अलग क्षेत्रों से सीधे चुनाव के जरिए तय होती हैं। यही सदन कानून बनाने और मौजूदा कानूनों में बदलाव की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है।

पुतिन पार्टी के सदस्य नहीं

एक दिलचस्प तथ्य यह है कि व्लादिमीर पुतिन खुद यूनाइटेड रशिया के औपचारिक सदस्य नहीं हैं। हालांकि वह 2008 से 2012 तक पार्टी के अध्यक्ष रहे थे। इसके बाद उन्होंने पद छोड़ दिया और दिमित्री मेदवेदेव ने पार्टी की कमान संभाली।

ड्रोन हमलों के बीच मतदान

रूस में चुनाव यूक्रेन के ड्रोन हमलों के बीच भी हुआ। मतदान के अंतिम दिन मॉस्को और आसपास के इलाकों में 1,600 से अधिक ड्रोन भेजे जाने का दावा किया गया। मॉस्को के मेयर सर्गेई सोबयानिन के अनुसार राजधानी को निशाना बनाकर करीब 450 ड्रोन भेजे गए थे।

अमेरिका के कड़े रुख पर रूस की चेतावनी! बढ़ा तनाव, जानें पूरा मामला

न्यूज डेस्क। अमेरिका और रूस के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 18 सितंबर 2026 को रूस और ईरान से जुड़े नए प्रतिबंध कानून पर हस्ताक्षर कर इसे लागू कर दिया। कानून का मकसद रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। इसमें रूसी ऊर्जा क्षेत्र और प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल होने वाले जहाजों के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधान भी शामिल हैं।

रूस ने शांति वार्ता को लेकर जताई चिंता

नए अमेरिकी कदम पर क्रेमलिन ने आपत्ति जताई है। प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव के अनुसार, अतिरिक्त अमेरिकी प्रतिबंध यूक्रेन में शांतिपूर्ण समाधान खोजने की कोशिशों को और मुश्किल बना सकते हैं। रूस का कहना है कि आर्थिक दबाव बढ़ने से पहले से जटिल कूटनीतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

रूस के तेल खरीदारों पर भी असर

नए कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है। हालांकि, यह शुल्क अपने आप लागू नहीं होता, बल्कि अमेरिकी प्रशासन को इसे लागू करने का अधिकार देता है। कानून में रूस से आने वाले कुछ सामान पर ऊंचे टैरिफ का प्रावधान भी रखा गया है।

मॉस्को की आगे की रणनीति पर नजर

रूसी अधिकारियों ने कानून को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने भी इसे रूस के खिलाफ कदम बताते हुए जवाब देने की बात कही है। ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका-रूस संबंधों और यूक्रेन में चल रही कूटनीतिक कोशिशों पर इस कानून के असर को लेकर नजर बनी रहेगी।

भारत का कड़ा रुख, रूस हुआ खुश, अमेरिका सन्न!

नई दिल्ली। रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की ओर से 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की तैयारी ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई चिंता पैदा कर दी है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंध विधेयक को 262-159 वोटों से मंजूरी दे दी है। यह कानून राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ऐसे देशों पर भारी टैरिफ लगाने का अधिकार देता है, जो रूसी तेल और गैस खरीदते हैं।

भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को बताया प्राथमिकता

अमेरिकी कदम पर भारत सरकार ने कहा है कि देश अपनी 140 करोड़ आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। जहां से जरूरत होगी वहां से तेल खरीदने की नीति जारी रखेगी। साथ ही भारत ने अपने व्यापार और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने की बात कही है।

भारत और अमेरिका के अधिकारियों के बीच पिछले कुछ महीनों में इस मुद्दे पर बातचीत भी हुई है। भारतीय पक्ष ने संभावित टैरिफ के असर को केवल द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित न मानते हुए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ने वाले प्रभावों को भी सामने रखा है।

अब आगे क्या होगा?

अमेरिकी सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद हाउस से भी विधेयक पारित हो चुका है। अब इसे कानून का रूप देने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी है। इसके बाद भी 100 प्रतिशत टैरिफ अपने आप लागू होना जरूरी नहीं है, क्योंकि राष्ट्रपति के पास शुल्क लगाने, दर बदलने या किसी देश को छूट देने जैसे अधिकार रहेंगे।

इसलिए फिलहाल भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि आगे अमेरिकी प्रशासन इस अधिकार का किस तरह इस्तेमाल करता है। इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार के साथ-साथ कच्चे तेल की खरीद और वैश्विक कीमतों पर भी पड़ सकता है।

रूस से तेल खरीद बना अहम मुद्दा

भारत के लिए रूसी तेल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी घरेलू जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर बना रहा और रूसी तेल की भारतीय खरीद करीब 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान था। ऐसे में यदि रूसी तेल खरीद पर अतिरिक्त अमेरिकी शुल्क लगाया जाता है, तो भारतीय रिफाइनरियों की लागत, आयात रणनीति और अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की कीमतों पर असर पड़ने की संभावना को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

भारत का बड़ा कदम, अमेरिका की उड़ी नींद, रूस खुश!

नई दिल्ली। रूस से भारत की कच्चे तेल की खरीद अब अंतरराष्ट्रीय व्यापार चर्चा के केंद्र में है। इसकी सबसे बड़ी वजह खरीद की मात्रा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक रूस भारत के लिए कच्चे तेल का एक अहम सप्लायर बन चुका है। ऐसे में रूस से होने वाली तेल खरीद पर अमेरिकी संभावित प्रतिबंधों का मुद्दा भारत के लिए महत्वपूर्ण हो गया है।

रूस से करीब 40.8 अरब डॉलर का तेल

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में भारत ने रूस से करीब 40.8 अरब डॉलर यानी लगभग 4 लाख करोड़ रुपये का कच्चा तेल खरीदा। यह भारत के कुल 134.7 अरब डॉलर के क्रूड ऑयल आयात का करीब 30.3 प्रतिशत था। यानी भारत के विदेश से खरीदे गए हर 100 डॉलर के कच्चे तेल में करीब 30 डॉलर की हिस्सेदारी रूस की रही।

जुलाई तक और बढ़ गई रूस की हिस्सेदारी

रूस से तेल खरीद की अहमियत इस आंकड़े से भी समझी जा सकती है कि जुलाई 2026 तक भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 51 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। हालांकि, महीने-दर-महीने आयात की मात्रा में बदलाव होता रहता है। हालिया बाजार आंकड़ों में अगस्त में भारत का रूसी क्रूड आयात जुलाई की तुलना में कम रहने का अनुमान भी सामने आया है।

भारत के लिए क्यों अहम है रूसी तेल?

रूस से मिलने वाले कच्चे तेल ने भारतीय रिफाइनरों को अपेक्षाकृत कम कीमत पर कच्चा माल उपलब्ध कराया है। इससे भारत के कुल तेल आयात खर्च को नियंत्रित रखने में मदद मिली है। चूंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है, इसलिए कीमत और सप्लाई दोनों देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।

अब अमेरिका की नजर इसी खरीद पर

अमेरिका में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से जुड़ी पहल के बीच भारत की इतनी बड़ी रूसी तेल खरीद चर्चा में है। हालांकि, भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ अभी अपने आप लागू नहीं हुआ है। किसी भी संभावित शुल्क का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी नीति किस रूप में लागू होती है और किन देशों व उत्पादों को उसके दायरे में रखा जाता है।

चीन-रूस ने कर दिया खेल! अमेरिका की बढ़ी टेंशन, अब भारत क्या करेगा?

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय कारोबार में अमेरिकी डॉलर का दबदबा अभी कायम है, लेकिन चीन और रूस के बीच बढ़ता स्थानीय मुद्रा में कारोबार वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव का संकेत दे रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस ने चीन के साथ व्यापार में युआन और रूबल के इस्तेमाल को काफी बढ़ाया है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के मुताबिक, दोनों देशों के बीच 90% से ज्यादा व्यापार का भुगतान रूबल और युआन में हो रहा है।

चीन-रूस का बढ़ता युआन-रूबल कारोबार

रूस के लिए चीन अब बेहद अहम व्यापारिक साझेदार है। ऊर्जा समेत कई बड़े सौदों में डॉलर की जगह दोनों देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ा है। इसी के साथ चीन का CIPS और रूस का SPFS जैसे भुगतान ढांचे भी पश्चिमी वित्तीय नेटवर्क के बाहर लेनदेन के विकल्प उपलब्ध करा रहे हैं।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। IMF के अनुसार 2026 की पहली तिमाही में दुनिया के आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी 57.13% थी। इसके मुकाबले चीनी युआन की हिस्सेदारी करीब 2% है। यानी चीन-रूस की पहल महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन अभी डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को खत्म करने की स्थिति नहीं बनी है।

अमेरिका के लिए चुनौती कितनी बड़ी?

चीन की ताकत उसके विशाल व्यापार और मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क में है। अगस्त 2026 में चीन का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 3.438 ट्रिलियन डॉलर था, जो दुनिया में सबसे बड़ा है। उसी महीने युआन डॉलर के मुकाबले 0.49% मजबूत हुआ। इसलिए अगर चीन और उसके व्यापारिक साझेदार स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन बढ़ाते हैं, तो लंबे समय में डॉलर की मांग के कुछ हिस्से पर असर पड़ सकता है।

भारत के लिए क्या है बड़ा मौका?

भारत के लिए यह बदलाव चुनौती के साथ अवसर भी लेकर आता है। रूस के साथ भारत ने रुपये-रूबल आधारित भुगतान व्यवस्था को मजबूत किया है। सितंबर 2026 में रूसी बैंकिंग अधिकारियों ने बताया कि दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार का करीब 96% हिस्सा रुपये और रूबल में निपट रहा है। भारत-रूस व्यापार 2024 में रिकॉर्ड करीब 70 अरब डॉलर तक पहुंचा था।

अमेरिका vs चीन की जोरदार टक्कर! GDP, रक्षा बजट और सैन्य ताकत में कौन नंबर-1?

नई दिल्ली। दुनिया की दो सबसे प्रभावशाली ताकतों अमेरिका और चीन के बीच मुकाबला केवल व्यापार और तकनीक तक सीमित नहीं है। अर्थव्यवस्था, रक्षा बजट, सैन्य क्षमता और वैश्विक प्रभाव के मोर्चे पर भी दोनों देशों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा है। 2026 के उपलब्ध आंकड़ों पर नजर डालें तो GDP और सैन्य ताकत के कई प्रमुख पैमानों पर अमेरिका अभी भी आगे है, जबकि चीन तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।

GDP में अमेरिका की बढ़त

IMF के 2026 के अनुमान के मुताबिक अमेरिका की नॉमिनल GDP करीब 31.82 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि चीन की अर्थव्यवस्था लगभग 20.65 ट्रिलियन डॉलर की है। यानी बाजार विनिमय दर पर अमेरिका की अर्थव्यवस्था चीन से काफी बड़ी है। हालांकि PPP यानी क्रय शक्ति समानता के आधार पर तस्वीर बदल जाती है और चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका से बड़ी हो जाती है।

रक्षा खर्च में भी अमेरिका आगे

SIPRI के 2025 के नवीनतम तुलनीय आंकड़ों के अनुसार अमेरिका ने करीब 954 अरब डॉलर सैन्य खर्च किया, जबकि चीन का अनुमानित सैन्य खर्च 336 अरब डॉलर रहा। यानी रक्षा खर्च के मामले में अमेरिका का खर्च चीन से करीब तीन गुना है।

चीन ने हालांकि 2026 के लिए अपना आधिकारिक रक्षा बजट 1.91 ट्रिलियन युआन यानी करीब 276.7 अरब डॉलर घोषित किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के वास्तविक सैन्य खर्च का अनुमान आधिकारिक आंकड़े से अधिक हो सकता है।

सैन्य ताकत में कौन आगे?

Global Firepower की 2026 रैंकिंग में अमेरिका पहले और चीन तीसरे स्थान पर है। यह रैंकिंग पारंपरिक सैन्य क्षमता के आकलन में जनशक्ति, हथियार, वित्त, संसाधन और भौगोलिक स्थिति समेत 60 से अधिक कारकों को देखती है।

चीन की सबसे बड़ी ताकत उसकी तेजी से बढ़ती सैन्य आधुनिकीकरण क्षमता, विशाल औद्योगिक आधार और क्षेत्रीय सैन्य शक्ति है। वहीं अमेरिका के पास वैश्विक स्तर पर सैन्य पहुंच, बड़े रक्षा खर्च और अत्याधुनिक तकनीकी क्षमताओं का मजबूत आधार है।

सिर्फ अमेरिका नहीं, ये 4 देश भी हैं सुपरपावर? जानिए कौन-कौन है लिस्ट में

नई दिल्ली। दुनिया की ताकत का आकलन केवल सैन्य शक्ति से नहीं होता। किसी देश की अर्थव्यवस्था, परमाणु क्षमता, तकनीक, कूटनीतिक प्रभाव, प्राकृतिक संसाधन और वैश्विक व्यापार में भूमिका भी उसकी ताकत तय करती है। 

इसी वजह से अमेरिका के अलावा चीन, रूस और भारत जैसे देशों को भी वैश्विक शक्ति के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है। हालांकि, 'सुपरपावर' की कोई एक आधिकारिक और सर्वमान्य सूची नहीं है। कुछ विश्लेषणों में फिलहाल अमेरिका को एकमात्र पूर्ण सुपरपावर माना जाता है, जबकि चीन, रूस और भारत को संभावित या उभरती महाशक्तियों के रूप में देखा जाता है।

अमेरिका क्यों सबसे आगे?

अमेरिका की ताकत उसकी विशाल अर्थव्यवस्था, अत्याधुनिक तकनीक, दुनिया भर में सैन्य पहुंच, डॉलर की वैश्विक भूमिका और मजबूत गठबंधनों से आती है। 2026 के Global Firepower आकलन में भी अमेरिका सैन्य शक्ति के मामले में पहले स्थान पर है।

चीन की तेजी से बढ़ती ताकत

चीन दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक और व्यापारिक शक्तियों में शामिल है। इसके साथ ही उसकी सैन्य और तकनीकी क्षमता भी तेजी से बढ़ी है। वैश्विक राजनीति में चीन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है और BRICS जैसे मंचों में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। जीडीपी के मामले में भी अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर आता हैं।

रूस की अलग पहचान

रूस की सबसे बड़ी ताकतों में उसका परमाणु हथियारों का विशाल भंडार, सैन्य क्षमता, ऊर्जा संसाधन और रक्षा उद्योग शामिल हैं। Global Firepower की 2026 रैंकिंग में रूस दूसरे स्थान पर है। हालांकि जीडीपी के मामले में रूस की स्थिति उतनी बेहतर नहीं हैं, लेकिन सैन्य ताकत उसे एक महाशक्ति बनाता हैं।

भारत भी बन रहा बड़ा शक्ति केंद्र

भारत की विशाल आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, परमाणु क्षमता, अंतरिक्ष कार्यक्रम, सैन्य ताकत और बढ़ते वैश्विक कूटनीतिक प्रभाव ने उसे दुनिया में एक महत्वपूर्ण शक्ति बना दिया है। 2026 की Global Firepower रैंकिंग में भी भारत चौथे स्थान पर है।

बड़ी खुशखबरी! भारत को मिलेगा वीटो पावर? यूएन चीफ के बयान से मची हलचल

नई दिल्ली। वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती भूमिका के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर बड़ा बयान सामने आया है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद के विस्तार की जरूरत का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था 1945 के दौर से काफी बदल चुकी है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भी बदलाव जरूरी है।

भारत की दावेदारी को मिला समर्थन

गुटेरेस ने भारत का जिक्र करते हुए कहा कि वह सुरक्षा परिषद में विस्तार की मांग करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। इससे सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और वीटो अधिकार को लेकर भारत की लंबे समय से चली आ रही मांग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिलने की उम्मीद बढ़ी है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को अभी वीटो पावर मिल गया है। सुरक्षा परिषद में सुधार और नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने के लिए आगे लंबी कूटनीतिक प्रक्रिया जरूरी होगी।

रूस-चीन भी भारत के साथ?

ब्रिक्स की नई दिल्ली घोषणा में रूस और चीन ने भी भारत और ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका देने के समर्थन को दोहराया है। दोनों देश मौजूदा स्थायी सदस्य हैं और उनके पास वीटो अधिकार है। ऐसे में भारत की दावेदारी के समर्थन को अहम माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ब्रिक्स मंच से वैश्विक दक्षिण की भूमिका बढ़ाने की बात कही। अब नजर इस बात पर है कि आने वाले वर्षों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कितना बड़ा बदलाव होता है और क्या भारत को स्थायी सीट के साथ वीटो का अधिकार मिल पाता है।

रूस ने BRICS देशों को दिए शानदार ऑफर, अमेरिका-यूरोप की बढ़ी टेंशन?

नई दिल्ली। BRICS के मंच से रूस ने आर्थिक सहयोग को नई दिशा देने की पहल की है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सदस्य देशों के बीच एक साझा इंश्योरेंस सिस्टम और अनाज का संयुक्त बाजार बनाने का प्रस्ताव रखा। उनका कहना है कि बाहरी आर्थिक दबावों के बावजूद BRICS देश पूंजी, तकनीक और श्रम के क्षेत्र में आपसी सहयोग के नए रास्ते तैयार कर सकते हैं।

रूस के दो बड़े प्रस्ताव

BRICS शिखर सम्मेलन के अंतिम सत्र में पुतिन ने कहा कि समूह के पास आगे बढ़ने के लिए कई योजनाएं हैं। इनमें साझा बीमा व्यवस्था और अनाज बाजार प्रमुख हैं। रूस ने दूसरे सदस्य देशों को इन पहलों में शामिल होने का न्योता भी दिया है।

साझा बीमा व्यवस्था का प्रस्ताव रूस के लिए खास महत्व रखता है। पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूसी ऊर्जा कारोबार से जुड़ी कंपनियों और जहाजों के लिए बीमा व्यवस्था पर दबाव रहा है। ऐसे में BRICS देशों के बीच वैकल्पिक वित्तीय और बीमा तंत्र तैयार होने से रूस समेत अन्य सदस्य देशों को फायदा मिल सकता है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका

पुतिन ने BRICS के न्यू डेवलपमेंट बैंक के कामकाज की भी सराहना की। उन्होंने बताया कि बैंक करीब 140 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट्स से जुड़ा हुआ है। रूस का मानना है कि ऐसी संस्थाएं उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच स्वतंत्र आर्थिक सहयोग को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

ग्लोबल साउथ को एकजुट होने का संदेश

पुतिन ने आर्थिक मुद्दों के साथ-साथ वैश्विक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर भी जोर दिया। उन्होंने BRICS और ग्लोबल साउथ के देशों से समस्याओं के सिर्फ तत्काल असर पर नहीं, बल्कि उनके मूल कारणों पर भी मिलकर काम करने की अपील की।

BRICS के लगातार विस्तार ने भी इस समूह का प्रभाव बढ़ाया है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुआ यह मंच अब कई नए सदस्यों को अपने साथ जोड़ चुका है। बढ़ती सदस्यता के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में BRICS की भूमिका भी लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।

रूस के नए प्रस्तावों को इसी बढ़ते आर्थिक सहयोग की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। अगर साझा बीमा और अनाज बाजार जैसी योजनाएं आगे बढ़ती हैं, तो BRICS देशों के बीच पश्चिमी वित्तीय ढांचे से अलग सहयोग का दायरा और मजबूत हो सकता है।

रूस ने भारत को दिया "Voronezh-M" रडार का ऑफर, चीन-पाक के उड़े होश

नई दिल्ली। भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग को लेकर एक और बड़ा प्रस्ताव सामने आया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस ने भारत को Voronezh-M स्ट्रैटेजिक रडार देने की पेशकश की है। यह प्रस्ताव Su-57, S-400 और दूसरे रक्षा उपकरणों से जुड़े रूसी ऑफर्स के साथ सामने आया है।

हजारों किलोमीटर तक निगरानी

Voronezh-M को लंबी दूरी की निगरानी और बैलिस्टिक मिसाइलों की शुरुआती चेतावनी के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी रेंज करीब 6,000 से 8,000 किलोमीटर तक बताई जाती है और यह एक साथ बड़ी संख्या में लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है। रडार का इस्तेमाल मिसाइलों, विमानों और अंतरिक्ष से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखने में किया जा सकता है।

भारत के लिए क्यों अहम है?

अगर भारत में इस तरह की प्रणाली तैनात होती है तो देश की अर्ली वॉर्निंग और हवाई निगरानी क्षमता मजबूत हो सकती है। लंबी दूरी की निगरानी के कारण संभावित मिसाइल या हवाई खतरों का पहले पता लगाने में मदद मिल सकती है।

आपको बता दें का रूस का ये Voronezh रडार परिवार में अलग-अलग बैंड और क्षमताओं वाले संस्करण मौजूद हैं। हालांकि भारत को कौन सा संस्करण मिलेगा और इसकी तैनाती कहां होगी, इसे लेकर अभी अंतिम जानकारी सामने नहीं आई है।

फिलहाल यह रूस की ओर से दिया गया प्रस्ताव है और इसे लेकर किसी अंतिम खरीद समझौते की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। अगर सौदा आगे बढ़ता है तो यह भारत की रणनीतिक निगरानी व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

BRICS के 5 बड़े फैसले, दिल्ली के मंच से दुनिया को मिला बड़ा संदेश

नई दिल्ली। दिल्ली में आयोजित BRICS सम्मेलन में दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं एक मंच पर नजर आईं। 21 देशों की भागीदारी वाले इस सम्मेलन में 45 पन्नों के साझा घोषणा-पत्र के 140 बिंदुओं पर सहमति बनी। बैठक में बहुपक्षवाद, शांति, सुरक्षा और वैश्विक व्यापार को लेकर कई अहम फैसले सामने आए। इन फैसलों से भारत की कूटनीतिक ताकत भी उभरकर सामने आई।

1 .आतंकवाद और टेरर फंडिंग पर सख्त रुख

BRICS देशों ने आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया। घोषणा-पत्र में पहलगाम हमले का उल्लेख करते हुए आतंकवाद और उसे मिलने वाली आर्थिक मदद पर रोक लगाने की जरूरत पर जोर दिया गया। सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भी साझा चिंता सामने आई।

2 .समुद्री व्यापार की सुरक्षा पर रहा जोर

दुनिया के कई हिस्सों में जारी तनाव के बीच समुद्री रास्तों की सुरक्षा को लेकर भी सहमति बनी। व्यापारिक जहाजों और समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखने तथा विवादों का समाधान बातचीत के जरिए करने पर जोर दिया गया।

3 .व्यापार को आसान बनाने की पहल

बैठक में मनमाने ढंग से लगाए जाने वाले भारी टैरिफ को लेकर भी चिंता जताई गई। BRICS देशों ने 2026 से 2030 के बीच आपसी व्यापार और बाजारों तक पहुंच को बेहतर बनाने की दिशा में काम करने पर सहमति जताई।

4 .सैटेलाइट नेटवर्क से मौसम पर नजर

जलवायु परिवर्तन, बाढ़, सूखा और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए BRICS देशों के बीच सैटेलाइट सहयोग को बढ़ावा देने का फैसला अहम रहा। साझा सैटेलाइट नेटवर्क से मौसम और पर्यावरण से जुड़ी सूचनाओं को बेहतर तरीके से साझा करने में मदद मिल सकती है।

5 .UNSC में भारत की दावेदारी को समर्थन

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग भी सम्मेलन के प्रमुख मुद्दों में रही। भारत जैसे विकासशील देशों को सुरक्षा परिषद में उचित प्रतिनिधित्व देने की जरूरत पर जोर दिया गया। इसे भारत की लंबे समय से चली आ रही स्थायी सदस्यता की दावेदारी के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत के लिए क्या बदला?

सम्मेलन में भारत को कूटनीतिक स्तर पर कई अहम फायदे मिले। आतंकवाद के मुद्दे पर चीन समेत BRICS देशों की सहमति भारत के लिए महत्वपूर्ण रही। वहीं, भारत और चीन के बीच शीर्ष स्तर पर बातचीत से द्विपक्षीय संबंधों में सुधार की उम्मीद भी मजबूत हुई।

आर्थिक मोर्चे पर रूस की ओर से अपनी इवोल्गा ट्रेन की पेशकश और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने जैसे प्रस्ताव भी चर्चा में रहे। दिल्ली का BRICS मंच भारत के लिए केवल वैश्विक सम्मेलन नहीं, बल्कि कूटनीति, सुरक्षा और आर्थिक सहयोग के मोर्चे पर अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर साबित हुआ।

रूस ने दिया बड़ा तोहफा, भारत के किसानों के लिए आई खुशखबरी!

नई दिल्ली। भारत और रूस के मजबूत रिश्तों के बीच किसानों के लिए अच्छी खबर सामने आई है। रूस ने भारत को फर्टिलाइजर की सप्लाई बढ़ाने का फैसला किया है। रूसी फर्टिलाइजर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष आंद्रे गुरयेव के मुताबिक, इस साल के पहले छह महीनों में रूस से भारत को 2.8 मिलियन टन फर्टिलाइजर की आपूर्ति की जा चुकी है।

पिछले साल भी बढ़ी थी सप्लाई

गुरयेव ने बताया कि रूसी कंपनियों ने पिछले साल भारत को करीब 6.5 मिलियन टन फर्टिलाइजर भेजा था। यह एक साल पहले के मुकाबले लगभग 40 फीसदी ज्यादा था। उन्होंने कहा कि आज भारत द्वारा आयात किए जाने वाले हर तीन टन फर्टिलाइजर में से करीब एक टन रूस से आता है।

किसानों के लिए बड़ी खबर?

भारत में खेती के लिए फर्टिलाइजर की पर्याप्त उपलब्धता बेहद जरूरी है। रूस से सप्लाई बढ़ने से घरेलू बाजार में इसकी उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इससे किसानों को फसल उत्पादन के लिए जरूरी उर्वरक की आपूर्ति को लेकर राहत मिलने की उम्मीद है।

पुतिन ने दिया था भरोसा

रूसी अधिकारी के अनुसार, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत की फर्टिलाइजर जरूरतों को पूरा करने के लिए सप्लाई जारी रखने का निर्देश दिया था। अब रूस की ओर से बढ़ाई जा रही आपूर्ति को इसी प्रतिबद्धता से जोड़कर देखा जा रहा है। भारत-रूस के बीच कृषि और उर्वरक क्षेत्र में सहयोग आगे भी बढ़ने की उम्मीद है।

BRICS या G7, कौन है ज्यादा ताकतवर? GDP के आंकड़ों में सामने आई बड़ी तस्वीर

नई दिल्ली। दुनिया की आर्थिक ताकत का संतुलन तेजी से बदल रहा है। एक तरफ अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली, कनाडा और जापान वाला G7 है, तो दूसरी ओर भारत, चीन, रूस, ब्राजील समेत तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का BRICS समूह लगातार अपना दायरा बढ़ा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर आर्थिक ताकत के मामले में BRICS आगे है या G7?

PPP के हिसाब से BRICS का पलड़ा भारी

हालिया आंकड़ों और बयानों में BRICS की आर्थिक हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी बताई जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी BRICS देशों को दुनिया की करीब 40% GDP और 25% से अधिक वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधि बताया है। IMF के PPP आंकड़ों में भी BRICS की बड़ी हिस्सेदारी दिखाई देती है।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने नई दिल्ली में BRICS बिजनेस फोरम के दौरान दावा किया कि पिछले पांच वर्षों में BRICS देशों ने दुनिया की GDP में 40% से अधिक योगदान दिया, जबकि G7 की हिस्सेदारी 29% रही। उन्होंने इसी आधार पर G7 की आर्थिक स्थिति पर सवाल उठाया।

लेकिन एक जरूरी बात समझना जरूरी है

GDP की तुलना इस बात पर निर्भर करती है कि गणना PPP (Purchasing Power Parity) से की जा रही है या Nominal GDP से। PPP में देशों की घरेलू कीमतों और खरीदने की क्षमता को ध्यान में रखा जाता है। इस पैमाने पर BRICS का आकार G7 से बड़ा है।

वहीं Nominal GDP में अमेरिकी डॉलर की मौजूदा विनिमय दर के आधार पर अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन होता है। इस पैमाने पर G7 की आर्थिक ताकत अब भी काफी बड़ी है। इसलिए केवल एक आंकड़े के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि BRICS ने हर मामले में G7 को पीछे छोड़ दिया है।

BRICS की सबसे बड़ी ताकत क्या है?

BRICS की ताकत सिर्फ GDP तक सीमित नहीं है। इसके सदस्य देश दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और ऊर्जा, कच्चे माल, विनिर्माण, कृषि तथा बड़े उपभोक्ता बाजारों में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। 2026 में समूह के विस्तार के साथ इसका वैश्विक प्रभाव और बढ़ा है। भारत और चीन जैसे बड़े बाजार, रूस की ऊर्जा क्षमता और ब्राजील जैसे संसाधन संपन्न देश BRICS को अलग-अलग क्षेत्रों में मजबूत बनाते हैं।

G7 अभी भी दुनिया में क्यों महत्वपूर्ण है?

दूसरी ओर G7 के पास विकसित अर्थव्यवस्थाओं की मजबूत वित्तीय व्यवस्था, बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां, तकनीकी क्षमता और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में प्रभाव है। व्यापार और निवेश के क्षेत्र में भी G7 की पकड़ मजबूत बनी हुई है। इसलिए BRICS की बढ़ती GDP हिस्सेदारी का मतलब यह नहीं है कि G7 की वैश्विक ताकत खत्म हो गई है।

BRICS के पास 40% ग्लोबल GDP, पुतिन ने G7 को दिखाया आईना

नई दिल्ली। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने BRICS देशों के बीच आर्थिक सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा प्रस्ताव रखा है। उन्होंने व्यापार, बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और तकनीक से जुड़ी परियोजनाओं के लिए एक नया निवेश मंच बनाने की बात कही। इसके जरिए निजी क्षेत्र से पूंजी जुटाकर सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूती देने का लक्ष्य है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में BRICS का बढ़ता दबदबा

BRICS की आर्थिक ताकत का जिक्र करते हुए पुतिन ने दावा किया कि पिछले पांच वर्षों में वैश्विक GDP में समूह के देशों की हिस्सेदारी 40 फीसदी से ज्यादा रही है, जबकि G7 की हिस्सेदारी 29 फीसदी रही। उन्होंने कहा कि वैश्विक आर्थिक विकास के केंद्र लगातार बदल रहे हैं और नए क्षेत्र तेजी से उभर रहे हैं।

NDB के जरिए निवेश बढ़ाने की तैयारी

पुतिन ने प्रस्तावित निवेश मंच के लिए BRICS के न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) को आधार बनाने की संभावना जताई। उनका कहना है कि इससे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने में मदद मिल सकती है। रूस ने आर्कटिक ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं में सहयोग की भी इच्छा जताई।

AI और टेक्नोलॉजी पर भी जोर

BRICS के एजेंडे में सिर्फ व्यापार और इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्वायत्त परिवहन और फिनटेक जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं। पुतिन ने कहा कि रूस और अन्य BRICS देश तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने पर काम कर रहे हैं।

पश्चिमी प्रतिबंधों पर रूस का निशाना

पुतिन ने पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और व्यापारिक पाबंदियों की आलोचना करते हुए कहा कि रूस पर हजारों प्रतिबंध लगाए गए हैं। उनके मुताबिक, रूस ने नए व्यापारिक साझेदारों के साथ संबंध बढ़ाकर इसका सामना किया है। उन्होंने साफ कहा कि BRICS किसी देश के खिलाफ नहीं है, बल्कि अपने सदस्य देशों के आर्थिक हितों और सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दे रहा है।