पटना। बिहार में अगले पंचायत चुनाव को लेकर गांवों में राजनीतिक हलचल धीरे-धीरे बढ़ने लगी है। मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल वर्ष 2026 के आखिर में पूरा होने की संभावना के बीच संभावित उम्मीदवारों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। कई गांवों में संभावित दावेदार लोगों से संपर्क साधने और अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गए हैं।
हालांकि मुखिया पद के लिए चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे लोगों को केवल जनसंपर्क और राजनीतिक समीकरण पर ध्यान देने के बजाय कानूनी पात्रता और अयोग्यता के नियमों को भी समझना जरूरी है। नियमों पर खरा नहीं उतरने की स्थिति में नामांकन के स्तर पर ही परेशानी हो सकती है।
परिसीमन के बाद बदल सकता है चुनावी समीकरण
आगामी पंचायत चुनाव से पहले पंचायतों और वार्डों के परिसीमन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। इसके लिए वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाना है। आबादी और प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार पंचायतों और वार्डों की संरचना में बदलाव हो सकता है। परिसीमन के बाद पंचायतों की संख्या और आरक्षण व्यवस्था में भी बदलाव संभव है। इसका सीधा असर मुखिया पद के संभावित दावेदारों पर पड़ेगा। किसी पंचायत की सीट आरक्षित होने या सामान्य होने से चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकता है।
मुखिया चुनाव के लिए 21 साल उम्र जरूरी
मुखिया पद का चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष होनी चाहिए। इससे कम उम्र का व्यक्ति पंचायत चुनाव में मुखिया पद के लिए उम्मीदवार नहीं बन सकता। इसके साथ ही मतदाता सूची से जुड़ी पात्रता भी महत्वपूर्ण है। चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति को संबंधित चुनाव क्षेत्र से जुड़े मतदाता संबंधी नियमों का पालन करना होगा। इसलिए नामांकन से पहले मतदाता सूची में अपने नाम और अन्य विवरण की जांच करना समझदारी होगी।
सरकारी नौकरी करने वालों को ध्यान
सरकारी सेवा में कार्यरत लोगों के लिए चुनाव लड़ने को लेकर अलग नियम लागू होते हैं। केंद्र या राज्य सरकार के कर्मचारी सामान्य तौर पर अपने पद पर रहते हुए पंचायत चुनाव में उम्मीदवार नहीं बन सकते। इसी तरह स्थानीय निकाय या ऐसे पदों पर काम करने वाले लोगों की पात्रता भी संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर तय होती है। संभावित उम्मीदवारों को नामांकन से पहले अपनी नौकरी या पद की स्थिति की अच्छी तरह जांच कर लेनी चाहिए।
लाभ के पद से जुड़ा नियम भी अहम
यदि कोई व्यक्ति पंचायत के अधीन ऐसा पद रखता है जिससे उसे वेतन या अन्य लाभ प्राप्त होता है, तो यह चुनाव लड़ने की पात्रता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए उम्मीदवार को यह देखना होगा कि उसके पास ऐसा कोई पद तो नहीं है, जिसे कानून के तहत चुनावी अयोग्यता का आधार माना जा सकता है।
नागरिकता और मानसिक स्वास्थ्य
मुखिया पद के लिए उम्मीदवार का भारत का नागरिक होना आवश्यक है। इसके अलावा कानून में कुछ ऐसी परिस्थितियों का भी उल्लेख है, जिनमें व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो सकता है। उदाहरण के तौर पर सक्षम न्यायिक प्राधिकरण द्वारा मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित किए जाने की स्थिति में चुनाव लड़ने की पात्रता प्रभावित हो सकती है। इसलिए नामांकन के समय उम्मीदवार की कानूनी स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी।
सजा और बर्खास्तगी का भी असर
सरकारी सेवा से गंभीर कदाचार के कारण बर्खास्त किए गए व्यक्ति के मामले में भी चुनावी अयोग्यता के प्रावधान लागू हो सकते हैं। वहीं आपराधिक मामले में अदालत से हुई दोषसिद्धि और सजा की प्रकृति के आधार पर भी चुनाव लड़ने की पात्रता प्रभावित हो सकती है।
हालांकि केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होना और अदालत द्वारा दोषी ठहराया जाना एक जैसी स्थिति नहीं है। इसलिए आपराधिक मामलों से जुड़े संभावित उम्मीदवारों को अपने मामले की कानूनी स्थिति के आधार पर नियमों की जांच करनी चाहिए।
दस्तावेजों की तैयारी पहले से रखें पूरी
चुनाव की घोषणा और नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के बाद दस्तावेज तैयार करने के लिए समय कम मिल सकता है। ऐसे में संभावित उम्मीदवारों को अपनी उम्र से जुड़े प्रमाण, मतदाता सूची में विवरण, नागरिकता और आरक्षण श्रेणी से संबंधित जरूरी दस्तावेजों की स्थिति पहले ही जांच लेनी चाहिए। साथ ही नामांकन के समय निर्वाचन प्राधिकरण द्वारा मांगे जाने वाले दस्तावेज और शपथपत्र से जुड़ी आवश्यकताओं को भी ध्यान से समझना होगा।
अंतिम नियमों की जानकारी आधिकारिक अधिसूचना से लें
बिहार पंचायत चुनाव को लेकर परिसीमन, आरक्षण, चुनाव कार्यक्रम और नामांकन की अंतिम शर्तें संबंधित सरकारी अधिसूचनाओं और निर्वाचन प्राधिकरण के निर्देशों के अनुसार ही लागू होंगी। इसलिए संभावित उम्मीदवारों को किसी भी दावे या स्थानीय चर्चा के आधार पर अंतिम निर्णय लेने के बजाय आधिकारिक सूचना का इंतजार करना चाहिए।