रफ्तार और तकनीक का मेल
ब्रह्मोस-II को हाइपरसोनिक श्रेणी में विकसित किया जा रहा है, जिसकी संभावित गति मैक 7 से अधिक, यानी लगभग 8,500 किलोमीटर प्रति घंटे तक हो सकती है। इतनी तेज रफ्तार के कारण इसे ट्रैक करना और इंटरसेप्ट करना मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम्स के लिए बेहद मुश्किल माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस मिसाइल के सामने एस-400 जैसे अत्याधुनिक सिस्टम भी प्रभावी साबित नहीं होंगे।
रेंज में भी जबरदस्त बढ़ोतरी
मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल की रेंज करीब 290 किलोमीटर है, लेकिन नए वर्जन में इसे 450 किलोमीटर से लेकर 900 किलोमीटर तक बढ़ाने की योजना है। यह मिसाइल बेहद कम ऊंचाई पर उड़ान भरती है, जिससे दुश्मन के रडार इसे समय रहते पकड़ नहीं पाते। इसमें आधुनिक इनर्शियल नेविगेशन और सैटेलाइट गाइडेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो इसकी सटीकता को और बढ़ाता है।
हर प्लेटफॉर्म से लॉन्च की क्षमता
ब्रह्मोस-II को जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बियों से दागा जा सकेगा। यही वजह है कि इसे एक मल्टी-प्लेटफॉर्म स्ट्राइक वेपन माना जा रहा है। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, अगले कम से कम 10 वर्षों तक दुश्मन देशों के लिए इस मिसाइल की प्रभावी काट ढूंढ पाना बेहद कठिन होगा, चाहे वे अपने रडार और सेंसर तकनीक को कितना भी उन्नत क्यों न कर लें।
हाइपरसोनिक ग्लाइड से बढ़ेगी ताकत
जानकारों का कहना है कि ब्रह्मोस-II में हाइपरसोनिक ग्लाइड क्षमता शामिल की जा सकती है। इसका मतलब है कि यह मिसाइल वातावरण की ऊपरी परतों में बेहद तेज गति से फिसलते हुए लक्ष्य तक पहुंचेगी। इस तरह की तकनीक किसी भी डिफेंस नेटवर्क के लिए बड़ी चुनौती मानी जाती है, क्योंकि इसकी उड़ान प्रोफाइल पारंपरिक मिसाइलों से बिल्कुल अलग होती है।

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