यूपी में बिजली विभाग के निजीकरण की ये 7 शर्तें

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग के निजीकरण को लेकर हाल ही में एक हाई-लेवल बैठक हुई है, जिसमें कई महत्वपूर्ण शर्तें रखी गई हैं। इस बैठक के बाद यह साफ किया गया है कि निजीकरण के बावजूद कर्मचारियों, अधिकारियों, और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की जाएगी।

खबर के अनुसार निजीकरण के तहत, पूर्वांचल और दक्षिणांचल के दो डिस्कॉम (विधुत वितरण कंपनियां) पांच निजी कंपनियों को सौंपे जाएंगे। इन कंपनियों के चेयरमैन मुख्य सचिव होंगे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकार का नियंत्रण बरकरार रहेगा।

निजीकरण से संबंधित मुख्य शर्तें:

1 .मुख्य सचिव की अध्यक्षता: निजी कंपनियों के चेयरमैन के रूप में मुख्य सचिव नियुक्त किए जाएंगे, जिससे सुधार प्रक्रिया का संचालन राज्य सरकार के नियंत्रण में रहेगा।

2 .बिजली वितरण कार्यों की अनुमति: निजी कंपनियों को सिर्फ बिजली वितरण कार्यों की अनुमति दी जाएगी, जबकि भूमि का स्वामित्व नहीं दिया जाएगा।

3 .व्यावसायिक उपयोग पर प्रतिबंध: डिस्कॉम की संपत्तियों का उपयोग शॉपिंग मॉल, दुकानों या अन्य व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाएगा।

4 .पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा: उत्तर प्रदेश में निजी कंपनियों के चयन के लिए प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक होगी।

5 .कर्मचारियों की सुरक्षा: किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की छंटनी नहीं की जाएगी। विद्युत अधिनियम-2003 के तहत यह सुनिश्चित किया गया है कि नई कंपनियों में मर्जर के बाद भी कर्मचारियों की सेवाएं सुरक्षित रहेंगी।

6 .पेंशन का दायित्व राज्य सरकार का: उत्तर प्रदेश के बिजली विभाग के कर्मचारियों की पेंशन का पूरा दायित्व राज्य सरकार पर रहेगा।

7 .वीआरएस का विकल्प: रिफॉर्म प्रक्रिया के तहत कर्मचारियों के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) का विकल्प होगा, लेकिन वीआरएस लेने वाले कर्मचारियों पर दो साल तक कहीं और नौकरी करने का प्रतिबंध नहीं होगा।

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