इसमें यह तय किया जाएगा कि कौन-सी भूमि गैर-मजरुआ खास है और कौन-सी भूमि गैर-मजरुआ आम है। इसके अलावा, पुश्तैनी या रैयती भूमि को लेकर भी सरकार नये निर्णय ले सकती है। यह कदम राज्य में भूमि विवादों को कम करने और कृषि, आवासीय तथा व्यावसायिक भूमि के बेहतर प्रबंधन के लिए उठाया गया है।
1920 के आधार पर वर्तमान भूमि प्रकृति का निर्धारण
वर्तमान में बिहार राज्य में भूमि की प्रकृति का निर्धारण 1920 में ब्रिटिश शासन के तहत किए गए कैडेस्ट्रल सर्वे और 1968-72 के बीच किए गए रीविजनल सर्वे पर आधारित है। उन क्षेत्रों में जहां रीविजनल सर्वे नहीं हुआ था, वहां 1920 का सर्वे ही मान्य माना गया है। इस सर्वे के आधार पर भूमि की जो प्रकृति निर्धारित की गई थी, वह आज भी प्रचलित है।
हालांकि, कुछ मामलों में सरकार ने कुछ विशेष परियोजनाओं या योजनाओं को ध्यान में रखते हुए भूमि की प्रकृति में अस्थायी बदलाव किए हैं। इसके बावजूद, कई जिलों में अंचलाधिकारी या अन्य अधिकारी अपनी ओर से जमीन की प्रकृति में बदलाव कर रहे हैं, जिससे भूमि विवाद उत्पन्न हो रहे हैं। ऐसी स्थितियों में भूमि की बिक्री और निबंधन पर भी रोक लगाई जा सकती है।
भूमि विवादों का निपटारा और समाधान
जमीन संबंधित विवादों के समाधान के लिए बिहार राज्य सरकार ने 2009 में बिहार भूमि विवाद निराकरण अधिनियम (बीएलडीआर) लागू किया था। इसके तहत, सभी जिलों में एडीएम (राजस्व) को अधिकृत किया गया है। इन अधिकारियों द्वारा आयोजित कोर्ट में भूमि विवादों का निपटारा किया जा सकता है। यदि किसी अंचल या अधिकारी से भूमि की प्रकृति में किसी प्रकार की गड़बड़ी होती है, तो उसे विभाग द्वारा जांचा जाता है और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है।
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