1 .GDP विकास दर:
मनमोहन सिंह सरकार (2004-2014) के कार्यकाल में औसत जीडीपी विकास दर 6.8% रही, जो उस समय की वैश्विक और राष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों के हिसाब से एक अच्छा प्रदर्शन था। इस दौरान भारत ने विभिन्न सुधारों और वैश्विक आर्थिक सुधारों का लाभ उठाया।
इसके विपरीत, मोदी सरकार (2014-2022) के दौरान औसत जीडीपी विकास दर 5.25% रही। हालांकि, कोविड-19 महामारी के प्रभाव को निकालने पर यह दर 6.84% तक पहुंच गई, जो मनमोहन सरकार के स्तर के बराबर है।
2 .मुद्रास्फीति:
मुद्रास्फीति दर भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है, और इसका असर आम नागरिकों की खरीदारी क्षमता पर पड़ता है। मनमोहन सरकार के दौरान मुद्रास्फीति औसतन 7.5% रही, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति थी।
वहीं, मोदी सरकार ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया और इसे औसतन 5% तक बनाए रखा। इस दौरान सरकार ने कई मौद्रिक नीति सुधार किए और आपूर्ति-श्रृंखला में सुधार की दिशा में काम किया, जिससे मुद्रास्फीति को अपेक्षाकृत कम रखने में मदद मिली।
3 .विदेशी कर्ज:
मनमोहन सरकार में भारत का विदेशी कर्ज मार्च 2014 में 440.6 बिलियन डॉलर था, लेकिन मोदी सरकार के तहत यह 2023 तक 613 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। हालांकि विदेशी कर्ज में वृद्धि हुई है, लेकिन यह स्थिति तब ज्यादा चिंता का कारण नहीं बनती जब तक कर्ज की चुकता क्षमता और कर्ज के प्रबंधन में सुधार देखा जाता है।
4 .व्यापार सुगमता:
मनमोहन सरकार के दौरान व्यापार सुगमता सूचकांक में भारत की रैंक 132 से गिरकर 134 हो गई थी। इस दौरान विभिन्न संरचनात्मक समस्याएं और व्यापार प्रक्रियाओं में जटिलताएं थीं, जिनकी वजह से व्यापार करने में मुश्किलें आती थीं।
मोदी सरकार ने इस क्षेत्र में सुधार किए और भारत ने व्यापार सुगमता सूचकांक में महत्वपूर्ण वृद्धि की। 2022 तक भारत 63वें स्थान पर पहुंच गया, जो एक उल्लेखनीय सुधार था। इसके पीछे डिजिटलीकरण, व्यापार प्रक्रियाओं के सरलिकरण, और सरकारी नीतियों में बदलाव मुख्य कारण थे।
5 .विदेशी मुद्रा भंडार:
मनमोहन सरकार के अंत में, यानी 2014 में, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 304.2 बिलियन डॉलर था। हालांकि, मोदी सरकार के तहत 2023 तक यह 595.98 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। यह वृद्धि दर्शाती है कि भारत ने अपनी मुद्रा भंडार को बेहतर तरीके से प्रबंधित किया है और विश्व बाजार में अपनी स्थिति को मजबूत किया है।
6 .वित्तीय घाटा और चालू खाता घाटा (CAD):
मनमोहन सरकार के दौरान औसत वित्तीय घाटा 4.3% और चालू खाता घाटा (CAD) 2.4% रहा, जबकि 2012-2013 में यह 4.8% तक बढ़ गया था। यह वित्तीय स्थिरता के लिए चिंता का विषय था, क्योंकि उच्च घाटा विदेशी निवेशकों को आशंकित कर सकता था और मुद्रा की अस्थिरता को बढ़ा सकता था।
मोदी सरकार ने वित्तीय घाटे को नियंत्रित किया और इसे औसतन 3.7% तक बनाए रखा। साथ ही, चालू खाता घाटा भी 1.6% पर स्थिर किया गया, जो यह दर्शाता है कि सरकार ने विदेशी व्यापार और आयात-निर्यात संतुलन को बेहतर बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाए।
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