तिलकुट की उत्पत्ति
तिलकुट बनाने की शुरुआत गया जिले से हुई थी। हिन्दू धर्म के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन तिल का दान और सेवन पुण्य के लिए माना जाता है। इस दिन तिलकुट खाना एक पारंपरिक अनिवार्यता बन चुकी है। तिलकुट एक प्रकार का मीठा, खस्ता और तिल से बने हुआ मिष्ठान है, जिसे हाथ से कूटकर तैयार किया जाता है। तिलकुट के निर्माण में ताजगी और स्वाभाविकता का खास ध्यान रखा जाता है, जो इसे अन्य जगहों से अलग और स्वादिष्ट बनाता है।
गया का रमना रोड: तिलकुट निर्माण का केंद्र
गया जिले का रमना रोड तिलकुट निर्माण के लिए प्रसिद्ध है। यहां के कारीगर पारंपरिक तरीके से तिल को हाथ से कूटकर तिलकुट तैयार करते हैं। इसके अलावा, टेकारी रोड, कोयरी बारी, स्टेशन रोड, डेल्हा समेत कई अन्य इलाकों में भी तिलकुट बनाने का काम होता है। गया में लगभग 200 से 250 परिवार इस कारीगरी से जुड़े हुए हैं और पारंपरिक तरीके से तिलकुट बनाने का काम करते हैं।
आजकल, गया की महिलाएं भी इस व्यवसाय में बड़ी संख्या में हिस्सा ले रही हैं। यह न केवल उनके आर्थिक सशक्तिकरण का एक स्रोत है, बल्कि पारंपरिक कला को बनाए रखने का भी एक तरीका है। गया का तिलकुट अपनी खस्ता और सोंधी महक के लिए प्रसिद्ध है।
यहां का तिलकुट खासकर झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में भेजा जाता है। इतना ही नहीं, विदेशों में भी इस तिलकुट की डिमांड बढ़ती जा रही है, खासकर उन पर्यटकों के बीच जो बोधगया आते हैं। ये पर्यटक अपने साथ गया का तिलकुट ले जाते हैं और इसे अपनी यात्रा की याद के तौर पर सहेजते हैं।

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