ट्रांजैक्शन एडवाइजर की नियुक्ति में देरी
बता दें की ट्रांजैक्शन एडवाइजर के लिए आवेदन करने वाली कंपनियों का टेंडर 5 फरवरी को खुलने वाला था। लेकिन अब यह तारीख बढ़ाकर 18 फरवरी कर दी गई है। इसका मतलब है कि ट्रांजैक्शन एडवाइजर की नियुक्ति में देरी होगी, और इस देरी के कारण निजीकरण की प्रक्रिया पर भी असर पड़ सकता है। यह देरी कई कारणों से हो रही है, जिसमें कानूनी और तकनीकी मुद्दे शामिल हैं।
टेंडर प्रक्रिया में देरी के कारण
टेंडर प्रक्रिया में देरी का मुख्य कारण कंपनियों के कई तकनीकी और वित्तीय मामले हैं, जो अभी तक सुलझाए नहीं जा सके हैं। सबसे बड़ा मामला 'कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' का है, जिसे लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं कि इस मामले में संबंधित अधिकारियों ने पर्याप्त कार्रवाई नहीं की। इसके चलते एनर्जी टास्क फोर्स को शिथिलता के आरोपों पर जांच करनी पड़ी, और रिपोर्ट आना अभी बाकी है। इस जटिल स्थिति ने निजीकरण की प्रक्रिया को धीमा कर दिया है।
उपभोक्ताओं और कर्मचारियों का विरोध
वहीं, राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने भी कहा है कि आने वाले समय में टेंडर प्रक्रिया में और भी देरी हो सकती है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि कंपनी के अंदर बहुत से तकनीकी और वित्तीय विवाद हैं, जिनका हल निकाले बिना आगे बढ़ना संभव नहीं होगा।
पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल
इस पूरे मामले की सबसे दिलचस्प बात यह है कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर देने की तैयारी चल रही है। एनर्जी टास्क फोर्स ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके तहत, निजी कंपनियां इन वितरण कंपनियों के संचालन में साझेदारी करेंगी, और इससे राज्य सरकार के ऊपर वित्तीय बोझ कम हो सकता है।
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