संघर्ष समिति ने यह भी दावा किया है कि संविदा कर्मियों को बिना किसी उचित कारण के, मनमाने तरीके से हटाया जा रहा है। इस कदम ने पूरे राज्य में बिजली कर्मचारियों के बीच भारी गुस्से को जन्म दिया है। अब यह देखना होगा कि प्रदेश सरकार और विभाग इस मुद्दे को किस प्रकार सुलझाते हैं।
संविदा कर्मियों की छंटनी का कारण
संघर्ष समिति के नेता राजीव सिंह ने 2019 के एक आदेश का हवाला दिया, जिसमें 55 वर्ष की आयु पूर्ण करने वाले संविदा कर्मियों को हटाए जाने का निर्देश दिया गया था। उनका कहना है कि यह कदम पूरी तरह से गलत है, क्योंकि ये कर्मी पिछले छह वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं और अब अचानक उन्हें नौकरी से बाहर किया जा रहा है। यह केवल निजीकरण की दिशा में एक साजिश हो सकती है, जिससे कर्मचारियों के बीच भय का वातावरण बने और वे इस बदलाव के प्रति सहमत हो जाएं।
विकलांग कर्मचारियों की स्थिति
संघर्ष समिति का कहना है कि वे कर्मचारी जो बेहद कम वेतन पर काम कर रहे थे, कुछ तो ऐसे भी हैं जो विभाग और उपभोक्ताओं की सेवा करते हुए विकलांग हो चुके हैं। अब उन्हें उनके श्रम का उचित मूल्य देने के बजाय, उन्हें नौकरी से हटा दिया गया है। इस प्रकार के निर्णय न केवल कर्मचारियों के साथ अन्यायपूर्ण हैं, बल्कि यह भी दर्शाता है कि राज्य विद्युत विभाग प्रबंधन अपनी जिम्मेदारियों से बचने और निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए काम कर रहा है।
निजीकरण की ओर बढ़ते कदम
संघर्ष समिति का आरोप है कि विभाग में इस छंटनी का उद्देश्य केवल निजीकरण के लिए माहौल तैयार करना है। 1200 में से सभी कर्मचारी 55 वर्ष की आयु के नहीं थे, लेकिन यह देखा गया है कि निजीकरण के बाद कई संविदा कर्मियों को हटाया जा रहा है। ऐसा अनुमान है कि इस प्रक्रिया में लगभग 20,000 संविदा कर्मियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है।
यह छंटनी केवल एक शुरुआती कदम है। संघर्ष समिति का कहना है कि जब संविदा कर्मियों को हटाया जा सकता है, तो भविष्य में नियमित कर्मचारियों की बारी भी आ सकती है। यह पूरी प्रक्रिया निजी कंपनियों की सुविधा को ध्यान में रखकर की जा रही है, ताकि उन्हें बिना किसी अड़चन के कार्य करने का मौका मिल सके।
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