एमवीआर का महत्व
एमवीआर, यानी मिनिमम वैल्यू रजिस्टर, वह न्यूनतम मूल्य होता है जिस पर किसी भी भूमि या संपत्ति का निबंधन (रजिस्ट्रेशन) किया जा सकता है। यह मूल्य दर राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है और यह भूमि के वास्तविक बाजार मूल्य से कहीं कम होती है। एमवीआर का उद्देश्य राज्य को राजस्व संग्रह में मदद करना और संपत्ति के बाजार में पारदर्शिता बनाए रखना होता है।
बिहार में एमवीआर को आखिरी बार 2016 में शहरी क्षेत्रों में बढ़ाया गया था, और अब एक बार फिर इसे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इस बदलाव का मुख्य कारण पिछले आठ वर्षों में भूमि के बाजार मूल्य में आई वृद्धि और भूमि के प्रकृति में हुए बदलाव हैं।
मूल्य निर्धारण प्रक्रिया में बदलाव
विभागीय सूत्रों के अनुसार, जिलों में गठित मूल्यांकन समितियां पिछले दस वर्षों के आधार पर भूमि के मूल्य का निर्धारण कर रही हैं। इस दौरान, जिस क्षेत्र में निबंधन की संख्या बढ़ी है, वहाँ के बाजार मूल्य और एमवीआर का अंतर ध्यान में रखा जाएगा। जिन इलाकों में रजिस्ट्रेशन की संख्या ज्यादा बढ़ी है, वहां के मूल्यांकन में अधिक ध्यान दिया जाएगा।
विभिन्न श्रेणियों में मूल्य निर्धारण
1 .विकसित क्षेत्र: जिन इलाकों में पहले से ही अच्छी सड़कें, मार्केट, स्कूल, अस्पताल आदि सुविधाएँ हैं, वहाँ की भूमि का मूल्य पहले से उच्च होता है। इन इलाकों में एमवीआर बढ़ाने का असर व्यापक रूप से देखा जा सकता है।
2 .विकासशील क्षेत्र: जिन इलाकों में विकास कार्य अभी चल रहे हैं या जिनमें भविष्य में विकास की संभावना है, वहाँ के मूल्यांकन में कुछ बदलाव किए जा सकते हैं। इन क्षेत्रों में विकास कार्य पूरा होने के बाद भूमि की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।
3 .प्रमुख सड़क और शाखा सड़क: मुख्य सड़क और शाखा सड़क के किनारे स्थित भूमि का मूल्य आमतौर पर ज्यादा होता है। इन क्षेत्रों की समीक्षा भी अलग-अलग की जाएगी, ताकि बाजार की वास्तविक स्थिति का सही आकलन किया जा सके।

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