कभी चीन से आगे था भारत की GDP, आज 5 गुना का अंतर!

न्यूज डेस्क: 1980 के दशक में जब भारत और चीन के आर्थिक आंकड़ों पर नज़र डाली जाती थी, तो दोनों देश लगभग समान आर्थिक स्थिति में खड़े थे। भारत की जीडीपी लगभग 186 बिलियन डॉलर थी, जबकि चीन की जीडीपी 303 बिलियन डॉलर के आसपास थी। तब किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ दशकों में यह अंतर इतनी बड़ी खाई में बदल जाएगा। 

एक रिपोर्ट के मुताबिक आज, 2025 में, चीन की जीडीपी भारत से लगभग पांच गुना अधिक हो चुकी है, और यह अंतर दोनों देशों के बीच बढ़ते आर्थिक असमानता को साफ तौर पर दर्शाता है। हालांकि, अब समय आ चुका है कि भारत भी चीन की तरह ही अपने मैन्युफैक्चरिंग और औद्योगिक क्षेत्रों को मजबूत करें, ताकि वह चीन के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कदम से कदम मिलाकर चल सके। 

चीन की आर्थिक वृद्धि

चीन की जीडीपी 1980 में 303 बिलियन डॉलर थी, जो आज 18.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच चुकी है। यह वृद्धि 61 गुना है, जो अपनी तरह का एक अद्वितीय उदाहरण है। 1980 के दशक से लेकर 2024 तक चीन ने दुनिया की सबसे तेज़ आर्थिक वृद्धि हासिल की है। इसके पीछे एक बड़ी वजह है चीन का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, जो न केवल देश के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण उत्पादक बन चुका है। चीन का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर वैश्विक उत्पादन में लगभग 28% योगदान देता है, जबकि भारत का मैन्युफैक्चरिंग योगदान सिर्फ 4% है।

चीन ने हाई-टेक उद्योगों में भी काफी निवेश किया है और इसका निर्यात भारत से 43 गुना अधिक है। उच्च तकनीकी और औद्योगिक उत्पादन में चीनी कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर प्रमुख स्थान पर हैं। इसके अलावा, चीन की सरकार ने अपनी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश किया, जिसके कारण वहां की उत्पादन क्षमता और निर्यात में भारी वृद्धि हुई।

भारत की आर्थिक वृद्धि

भारत की जीडीपी 1980 में 186 बिलियन डॉलर थी और आज 2024 में यह 3.93 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच चुकी है, जो 21 गुना अधिक है। भारत ने पिछले कुछ दशकों में भी प्रगति की है, लेकिन यह वृद्धि चीन से बहुत पीछे रही है। भारत के विकास में सबसे बड़ी भूमिका सेवा क्षेत्र की रही है, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और व्यापार सेवाओं में। हालांकि, भारत के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अब तक उतनी महत्वपूर्ण वृद्धि नहीं हो पाई है।

भारत में विभिन्न क्षेत्रों में सुधारों के बावजूद, बुनियादी ढांचे और विनिर्माण क्षेत्र में चुनौतियां बनी हुई हैं। यहां के शहरीकरण, उत्पादन क्षमता और नवाचार के स्तर में चीनी प्रतिस्पर्धा के मुकाबले अभी भी काफी अंतर है। हालांकि, भारत ने हाल ही में 'मेक इन इंडिया' जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ावा देने की कोशिश की है, लेकिन उसे चीनी स्तर तक पहुंचने में वक्त लगेगा।

चीन और भारत के आर्थिक असमानताएँ

चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी 25,015 डॉलर है, जो भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 10,123 डॉलर से लगभग दोगुना है। यह अंतर न केवल चीन के बेहतर औद्योगिक उत्पादन और निर्यात के कारण है, बल्कि इसके पीछे चीन की नीति और सरकार का दीर्घकालिक दृष्टिकोण भी जिम्मेदार है। चीन की सरकार ने अपनी योजनाओं को इस तरह से आकार दिया है कि देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया गया। 

दूसरी ओर, भारत ने अपने लोकतांत्रिक ढांचे और नीतिगत बाधाओं के कारण उतनी तीव्र गति से विकास नहीं किया है। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह किस प्रकार अपने उत्पादन क्षेत्र को बढ़ावा दे, ताकि वह चीन की तरह वैश्विक उत्पादन में योगदान दे सके। इसके अलावा, भारत को अपनी शिक्षा, बुनियादी ढांचा, और नवाचार के क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है, ताकि उसे चीन के मुकाबले प्रतिस्पर्धा करने के योग्य बनाया जा सके।

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