ब्रिक्स की कमान भारत के हाथ, अमेरिका के उड़ेंगे होश

नई दिल्ली। भारत 1 जनवरी 2026 से ब्रिक्स समूह की अध्यक्षता संभालने जा रहा है। यह केवल एक औपचारिक बदलाव नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में गहरे असर डालने वाला घटनाक्रम माना जा रहा है। ऐसे समय में भारत को यह जिम्मेदारी मिल रही है जब अमेरिका की नीतियों ने अनजाने में भारत, चीन और रूस जैसे देशों को एक साझा मंच पर और नज़दीक ला दिया है।

अमेरिका की चिंता क्यों बढ़ रही है?

ब्रिक्स की बढ़ती ताकत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका में इसे लेकर असहजता साफ दिख रही है। इस साल की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ब्रिक्स देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी इसी चिंता का संकेत थी। अमेरिका को डर है कि यदि ब्रिक्स देश आपसी सहयोग को और गहरा करते हैं, तो डॉलर आधारित वैश्विक व्यवस्था को सीधी चुनौती मिल सकती है।

ऊर्जा संसाधनों में ब्रिक्स की पकड़

ऊर्जा के मोर्चे पर ब्रिक्स देशों की स्थिति बेहद मजबूत है। हालिया वैश्विक ऊर्जा आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स समूह के देश मिलकर दुनिया के लगभग 42 प्रतिशत कच्चे तेल का उत्पादन करते हैं। यह संख्या बताती है कि ऊर्जा सुरक्षा के सवाल पर यह समूह किसी भी वैश्विक शक्ति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। भारत जैसे बड़े उपभोक्ता और रूस जैसे बड़े उत्पादक का एक ही मंच पर होना इस ताकत को और बढ़ाता है।

सोने के भंडार से बढ़ी सौदेबाज़ी की शक्ति

केवल तेल ही नहीं, सोने के भंडार के मामले में भी ब्रिक्स देश मजबूत स्थिति में हैं। चीन और रूस के पास केंद्रीय बैंकों में रखे गए वैश्विक स्वर्ण भंडार का बड़ा हिस्सा है, जबकि भारत का घरेलू स्वर्ण भंडार भी अत्यंत विशाल माना जाता है। कुल मिलाकर ब्रिक्स देशों के पास दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से के बराबर सोना है, जो आर्थिक संकट या मुद्रा अस्थिरता के समय बड़ी रणनीतिक ताकत बन सकता है।

वैश्विक GDP में ब्रिक्स का बढ़ता योगदान

आर्थिक दृष्टि से भी ब्रिक्स का कद लगातार बढ़ रहा है। विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल चीन, भारत, ब्राजील और रूस ने मिलकर 2024 में वैश्विक GDP का करीब 29 प्रतिशत योगदान दिया। नए देशों के जुड़ने और आपसी व्यापार बढ़ने से यह हिस्सा आने वाले वर्षों में और बढ़ सकता है। भारत की अध्यक्षता में इस आर्थिक सहयोग को नई दिशा मिलने की संभावना है।

कई ब्रिक्स देशों की डॉलर से दूरी की तैयारी

ब्रिक्स देशों का एक अहम साझा लक्ष्य डॉलर पर निर्भरता कम करना है। इसी दिशा में भारत ने हाल ही में बड़ा कदम उठाते हुए ब्रिक्स देशों के साथ पूरे व्यापार को भारतीय रुपये में करने की अनुमति दी है। इसके लिए भारतीय बैंकों को विशेष वोस्त्रो खाते खोलने की छूट दी गई है। इस व्यवस्था से न केवल व्यापार आसान होगा, बल्कि डॉलर की भूमिका को सीमित करने की प्रक्रिया भी तेज हो सकती है।

2026: बदलती वैश्विक व्यवस्था का संकेत

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता ऐसे दौर में आ रही है जब दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। ऊर्जा, मुद्रा, व्यापार और कूटनीति हर मोर्चे पर ब्रिक्स की सक्रियता बढ़ रही है। ऐसे में 2026 सिर्फ भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक राजनीति के लिए एक निर्णायक वर्ष साबित हो सकता है, जहां अमेरिकी वर्चस्व को खुली चुनौती मिलने के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। 

0 comments:

Post a Comment