कटाई बाद नुकसान बनी बड़ी चुनौती
भारत में खेती के बाद उपज को सुरक्षित रखने की समस्या लंबे समय से किसानों के लिए परेशानी का कारण रही है। अनुमान के अनुसार, देश में हर साल करीब 6 प्रतिशत कृषि उपज केवल इसलिए बर्बाद हो जाती है क्योंकि भंडारण और परिवहन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती। आर्थिक शोध संस्थानों के आकलन बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में इस वजह से सालाना लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। सरकार का मानना है कि यदि गांव और खेत के स्तर पर ही भंडारण की सुविधाएं उपलब्ध हों, तो इस भारी नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।
कोल्ड स्टोरेज और गोदामों पर होगा जोर
प्रस्तावित योजना के तहत नए फंड का इस्तेमाल मुख्य रूप से खेतों के पास भंडारण केंद्र, वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज और आधुनिक लॉजिस्टिक्स सिस्टम के निर्माण में किया जाएगा। इससे किसानों को सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि वे फसल कटते ही उसे औने-पौने दामों पर बेचने के लिए मजबूर नहीं होंगे। वे अपनी उपज को सुरक्षित रख सकेंगे और बाजार में बेहतर कीमत मिलने पर ही बिक्री कर पाएंगे। इससे बिचौलियों पर उनकी निर्भरता भी घटेगी और आमदनी में बढ़ोतरी होगी।
कोरोना काल में शुरू हुई योजना
एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड की शुरुआत जुलाई 2020 में की गई थी। तब से अब तक इस योजना के तहत देशभर में बड़ी संख्या में परियोजनाओं को मंजूरी मिली है। इन प्रोजेक्ट्स के जरिए फार्म मशीनरी बैंक, प्रोसेसिंग यूनिट्स, कोल्ड चेन और स्टोरेज सुविधाओं का विकास हुआ है। बैंकों की ओर से किसानों और उद्यमियों को बड़े पैमाने पर ऋण भी उपलब्ध कराया गया है, जिससे कृषि से जुड़े व्यवसायों को गति मिली है।
बजट से किसानों को बड़ी उम्मीद
कृषि मंत्रालय की ओर से सुझाव दिया गया है कि फंड में शेष राशि के साथ-साथ नई अतिरिक्त रकम को बजट के जरिए चरणबद्ध तरीके से जारी किया जाए। यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो आने वाले पांच वर्षों में कृषि ढांचे में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि योजना की सफलता के लिए जरूरी है कि छोटे और सीमांत किसानों तक इसकी जानकारी समय पर पहुंचे और उन्हें आसानी से इसका लाभ मिल सके।
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