दरअसल, अमेरिका ने हाल ही में ताइवान को 11.1 बिलियन डॉलर के हथियार सौदे को मंजूरी दी है। इस डील के तहत अमेरिकी कंपनियां ताइवान को हार्पून, जैवलिन और वायर-गाइडेड मिसाइलों समेत कई आधुनिक हथियार उपलब्ध कराएंगी। जैसे ही यह सौदा सार्वजनिक हुआ, चीन ने इसे अपने लिए सीधी चुनौती करार दिया।
ताइवान मुद्दे पर क्यों भड़का चीन?
चीन लंबे समय से ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और कई बार उसके विलय की बात भी कह चुका है। बीजिंग का साफ कहना है कि ताइवान से जुड़ा कोई भी अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर हमला है।चीन के विदेश मंत्रालय ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि ताइवान का मुद्दा चीन के मूल हितों से जुड़ा है।
किन अमेरिकी कंपनियों पर लगा प्रतिबंध?
चीन द्वारा प्रतिबंधित कंपनियां मुख्य रूप से रक्षा, ड्रोन और सैन्य तकनीक से जुड़ी हैं। इनमें प्रमुख नाम शामिल हैं: नॉर्थरोप ग्रुम्मन सिस्टम्स, एल3हैरिस मैरीटाइम सर्विसेज, बोइंग (सेंट लुइस यूनिट), रेड कैट होल्डिंग्स, टील ड्रोन्स, एपिरस, डेड्रोन होल्डिंग्स, ब्लू फोर्स टेक्नोलॉजीज, रोम्बस पावर, लाजरस एंटरप्राइजेज सहित कुल 20 कंपनियां। इनके अलावा 10 अमेरिकी अधिकारियों को भी प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया है।
प्रतिबंधों के तहत चीन क्या-क्या करेगा?
चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रतिबंधों के तहत: इन कंपनियों और अधिकारियों की चीन में मौजूद चल-अचल संपत्ति जब्त की जाएगी, चीन के भीतर व्यापार, निवेश और लेनदेन पर पूरी तरह रोक लगेगी, प्रतिबंधित अधिकारियों को चीन, हांगकांग और मकाऊ में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी, किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि पर सख्त निगरानी रखी जाएगी। चीन ने साफ शब्दों में कहा है कि ताइवान मामले में किसी भी तरह की उकसावे वाली कार्रवाई का जवाब और भी कठोर हो सकता है।

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