जनता और प्रशासन एक ही मंच पर
इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें जमीन से प्रभावित रैयत और संबंधित राजस्व अधिकारी एक ही स्थान पर मौजूद रहेंगे। इससे उन शिकायतों पर तुरंत चर्चा संभव होगी, जो आमतौर पर फाइलों में उलझकर वर्षों तक लंबित रहती हैं। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित इस संवाद को दो चरणों में रखा गया है, ताकि शिकायत निवारण और प्रशासनिक समीक्षा दोनों पर बराबर ध्यान दिया जा सके।
किन मुद्दों पर होगा फोकस
जन संवाद के दौरान जमीन से जुड़ी लगभग हर प्रमुख समस्या को एजेंडे में रखा गया है। दाखिल-खारिज और रिकॉर्ड सुधार से जुड़े लंबित आवेदन, ऑनलाइन मापी सेवाओं की स्थिति, भूमिहीन परिवारों को भूमि आवंटन की प्रगति, डिजिटल पोर्टल पर आ रही तकनीकी परेशानियां। सरकार का मानना है कि सीधे फीडबैक से सिस्टम की कमजोर कड़ियों को जल्दी सुधारा जा सकता है।
पंजीकरण से लेकर कार्रवाई तक निगरानी
कार्यक्रम में शामिल होने के लिए निर्धारित समय में पंजीकरण जरूरी किया गया है। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि हर शिकायत दर्ज हो और उस पर हुई कार्रवाई की जानकारी आवेदक तक पहुंचे। मोबाइल नंबर दर्ज कराने की व्यवस्था इसलिए की गई है, ताकि भविष्य में एसएमएस के जरिए अपडेट दिया जा सके।
जमाबंदी सुधार में तय समय-सीमा
सरकार ने जमीन रिकॉर्ड सुधार की प्रक्रिया को भी समयबद्ध बना दिया है। अब नाम, खाता, खेसरा या क्षेत्रफल से जुड़ी गलतियों को सुधारने के लिए अनिश्चित इंतजार नहीं करना पड़ेगा। त्रुटि के प्रकार के अनुसार 15 दिन से लेकर 75 कार्य दिवस तक की अधिकतम सीमा तय की गई है। समय पर काम नहीं होने पर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी।
डिजिटल रिकॉर्ड से बढ़ेगी पारदर्शिता
राज्य में करोड़ों जमाबंदियों को ऑनलाइन किए जाने के बाद कई पुरानी गलतियां सामने आई हैं। इन्हें ठीक करने के लिए परिमार्जन पोर्टल को और सरल बनाया गया है, ताकि आम लोग बिना बिचौलियों के अपने रिकॉर्ड दुरुस्त करा सकें। सरकार का दावा है कि इससे जमीन विवाद की जड़ पर चोट होगी।

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