रूस का बड़ा दांव! पुतिन ने दिया SCO बैंक बनाने का प्रस्ताव, डॉलर के दबदबे को लगेगा झटका?

नई दिल्ली: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को मजबूत करने के लिए एक बड़े वित्तीय संस्थान का प्रस्ताव रखा है। किर्गिस्तान के बिश्केक में हुए SCO शिखर सम्मेलन में पुतिन ने SCO डेवलपमेंट बैंक बनाने की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही। उनका जोर ऐसे वित्तीय ढांचे पर है जो सदस्य देशों को पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सके।

क्या होगा SCO डेवलपमेंट बैंक का काम?

अगर यह प्रस्ताव आकार लेता है तो बैंक का इस्तेमाल SCO देशों के बीच बड़े आर्थिक और बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स को वित्तीय सहायता देने में किया जा सकता है। ऊर्जा, परिवहन, इंफ्रास्ट्रक्चर और सीमा पार परियोजनाओं के लिए लंबी अवधि की फंडिंग उपलब्ध कराना इसका प्रमुख उद्देश्य हो सकता है। पुतिन ने इसे SCO के भीतर आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया है।

डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश

रूस लंबे समय से पश्चिमी प्रतिबंधों और वित्तीय दबाव के बीच डॉलर आधारित व्यवस्था पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। इसी संदर्भ में SCO के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिश भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है

भारत के लिए क्यों अहम है यह प्रस्ताव?

SCO में भारत, चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान और मध्य एशिया के कई देश शामिल हैं। ऐसे में कोई साझा विकास बैंक बनने पर सदस्य देशों के बीच इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यापारिक परियोजनाओं के लिए वित्त जुटाने का नया रास्ता खुल सकता है। भारत के लिए इसका महत्व इस बात में हो सकता है कि उसे पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था को छोड़ने के बजाय एक अतिरिक्त वित्तीय विकल्प मिल सकता है। 

हालांकि, भारत की नीति यह रही है कि SCO को किसी एक देश या समूह के खिलाफ मंच के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसलिए इस बैंक की भूमिका केवल पश्चिम-विरोधी संस्था के बजाय व्यावहारिक आर्थिक सहयोग तक सीमित रहना अधिक महत्वपूर्ण होगा।

चीन और भारत के सामने भी चुनौतियां

SCO बैंक का विचार सुनने में बड़ा जरूर है, लेकिन इसे जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा। बैंक की पूंजी कौन देगा, इसका मुख्यालय कहां होगा, फैसले लेने की व्यवस्था क्या होगी और सदस्य देशों के बीच हिस्सेदारी कैसे तय होगी, इन सभी मुद्दों पर सहमति जरूरी होगी।

बैंक को पश्चिमी वित्तीय प्रणाली से पूरी तरह अलग रखना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि भारत और चीन समेत कई सदस्य देशों के बैंक और कंपनियां वैश्विक वित्तीय बाजारों से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसके अलावा, पश्चिमी प्रतिबंधों और संभावित सेकेंडरी सैंक्शंस का जोखिम भी देशों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा।

अभी प्रस्ताव, आगे की राह पर नजर

बिश्केक सम्मेलन में SCO डेवलपमेंट बैंक को लेकर राजनीतिक स्तर पर प्रगति जरूर हुई, लेकिन इसे वास्तविक बैंक बनने में अभी कई चरण बाकी हैं। बैंक की स्थापना, पूंजी और संचालन से जुड़े सवालों पर सदस्य देशों को अंतिम सहमति बनानी होगी।

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