अमेरिकी छूट का क्या है महत्व?
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने इस फैसले को अल्पकालिक राहत के रूप में पेश किया है। अमेरिका ने स्पष्ट किया कि यह छूट केवल उन तेल खेपों पर लागू होगी जो पहले से समुद्र में ट्रांजिट में फंसी हुई हैं। ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, “इस कदम से रूस को कोई बड़ा वित्तीय लाभ नहीं होगा, लेकिन वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित नहीं होगी।”
भारतीय रिफाइनरियों को फायदा
इस विशेष अनुमति का सबसे बड़ा फायदा भारत की सरकारी तेल कंपनियों को होगा। इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL), हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) और मंगलोर रिफाइनरी (MRPL) अब रूस से तेल की डिलीवरी को तुरंत सुनिश्चित करने में सक्षम हैं। खासकर HPCL और MRPL के लिए यह बड़ी वापसी है, क्योंकि ये कंपनियां पिछले साल नवंबर के बाद रूस से तेल नहीं खरीद रही थीं।
कीमतों में हुआ है बदलाव
हालांकि भारत को अब रूस से तेल मिल रहा है, लेकिन यह पहले जितना सस्ता नहीं है। फरवरी 2026 तक रूस का 'यूराल्स क्रूड' भारत को लगभग 13 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर मिलता था। लेकिन अब मार्च और अप्रैल में आने वाली खेपों के लिए कीमतें बढ़कर अंतरराष्ट्रीय 'ब्रेंट क्रूड' से 4-5 डॉलर प्रति बैरल अधिक हो गई हैं। इसका मतलब है कि तेल तो भारत को मिल रहा है, लेकिन पहले जैसी भारी छूट अब उपलब्ध नहीं है।
वैश्विक तेल बाजार पर असर
इस अमेरिकी निर्णय से वैश्विक तेल बाजार में अचानक कीमतों में उछाल से बचाव होगा और आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित नहीं होगी। साथ ही भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सक्षम रहेगा। इस 30 दिन की खिड़की ने भारतीय कंपनियों को रूस से तेल खरीदने के लिए सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराया है, जिससे घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।
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