सरकार का मानना है कि सड़क निर्माण और रखरखाव की बढ़ती लागत को देखते हुए टोल प्रणाली को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से टोल छूट से जुड़ी मौजूदा व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जा रहा है।
वर्षों पुरानी व्यवस्था में हो सकता है बदलाव
फिलहाल देश में कुछ संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों और चुनिंदा सरकारी वाहनों को टोल टैक्स से छूट प्राप्त है। इस व्यवस्था के तहत कई सरकारी अधिकारी और विभागीय वाहन बिना टोल शुल्क दिए राष्ट्रीय राजमार्गों का उपयोग करते हैं। लेकिन अब सरकार इस सूची को सीमित करने या कुछ मामलों में समाप्त करने पर विचार कर रही है।
सरकार को बढ़ सकता है राजस्व
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि टोल मुक्त वाहनों की संख्या घटती है तो सरकार के राजस्व में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है। वर्तमान समय में देशभर में नए एक्सप्रेसवे और हाईवे परियोजनाओं पर बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है। इन परियोजनाओं के निर्माण और रखरखाव के लिए निरंतर वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। ऐसे में टोल संग्रह बढ़ने से सड़क अवसंरचना के विकास को अतिरिक्त गति मिल सकती है।
समान नियम लागू करने की मांग
इस प्रस्ताव को लेकर आम लोगों के बीच भी चर्चा शुरू हो गई है। कई लोगों का मानना है कि यदि आम नागरिक टोल टैक्स का भुगतान करते हैं तो अधिकांश सरकारी और विशेष श्रेणी के वाहनों पर भी समान नियम लागू होने चाहिए। इससे व्यवस्था में समानता और पारदर्शिता बढ़ेगी।
अभी अंतिम निर्णय बाकी
फिलहाल सरकार ने इस विषय पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। विभिन्न मंत्रालयों और संबंधित विभागों से सुझाव लिए जा रहे हैं। सभी पहलुओं पर विचार-विमर्श के बाद ही यह तय होगा कि टोल छूट की व्यवस्था में कितना बदलाव किया जाएगा। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो देश की टोल प्रणाली में यह एक बड़ा सुधार माना जाएगा, जिसका असर लाखों वाहनों और सरकारी तंत्र पर देखने को मिल सकता है।
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