हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शिक्षकों से वर्षों तक संविदा पर काम लेना, लेकिन उन्हें उचित वेतन और नौकरी की सुरक्षा नहीं देना संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत जबरन श्रम कराने जैसा है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि शिक्षकों को मिलने वाला मानदेय अर्धकुशल श्रमिकों की निर्धारित मजदूरी से भी कम है, जो बेहद गंभीर स्थिति है।
सभी KGBV शिक्षकों को मिलेगा लाभ
अदालत ने निर्देश दिया है कि जब तक सरकार जरूरी कदम नहीं उठाती, तब तक KGBV में कार्यरत सभी शिक्षकों को 17,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाए। यह व्यवस्था सिर्फ अदालत में याचिका दाखिल करने वाले शिक्षकों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि प्रदेश के सभी कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों के शिक्षकों पर लागू होगी।
इसके अलावा सरकार को चार महीने के अंदर शिक्षकों के पद स्वीकृत या सृजित करने और उनकी सेवा शर्तें इंटरमीडिएट स्तर के नियमित शिक्षकों के समान बनाने पर भी कार्रवाई करनी होगी।
नियमितीकरण और सेवा सुरक्षा पर भी जोर
हाईकोर्ट ने सरकार से कहा है कि याचिकाकर्ताओं और उनके जैसी स्थिति में काम कर रहे अन्य शिक्षकों के नियमितीकरण के दावों पर उनकी शैक्षिक योग्यता और सेवाकाल को ध्यान में रखते हुए नियमानुसार फैसला लिया जाए। शिक्षकों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत मिलने वाले सेवा संबंधी संरक्षण का लाभ देने का भी निर्देश दिया गया है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र से धनराशि मिलने में देरी का हवाला देकर राज्य सरकार आदेश लागू करने से पीछे नहीं हट सकती। साथ ही शिक्षकों के मानदेय में समय-समय पर संशोधन कर उसे सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों के वेतन एवं सुविधाओं के अनुरूप लाने की व्यवस्था करने को कहा है।

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