12 साल में ही क्यों लगता है महाकुंभ, कैसे तय होती हैं डेट?

धर्म डेस्क: महाकुंभ मेला हर 12 साल में क्यों लगता है, यह एक धार्मिक और खगोलीय मान्यता पर आधारित है। कुंभ मेला भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह विशेष रूप से हिंदू धर्म के अनुयायियों द्वारा मनाया जाता है।

महाकुंभ मेला और 12 साल का अंतर:

कुंभ मेला उन स्थानों पर आयोजित होता है जहां पवित्र नदियों का संगम होता है, जैसे कि इलाहाबाद (प्रयागराज), हरिद्वार, उज्जैन और नासिक। महाकुंभ मेला हर 12 साल में एक बार होता है, और यह एक विशिष्ट धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है।

इसका मुख्य कारण यह है कि हिंदू धर्म में यह विश्वास है कि प्रत्येक 12 वर्षों में ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति में एक विशेष परिवर्तन होता है, जिससे पृथ्वी पर एक विशिष्ट सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही समय होता है जब तीर्थयात्री विशेष रूप से पवित्र नदियों में स्नान करने आते हैं ताकि वे अपने पापों से मुक्ति पा सकें और पुण्य अर्जित कर सकें।

महाकुंभ मेला की तारीखों का निर्धारण कैसे होता है:

महाकुंभ मेला का आयोजन एक खगोलीय गणना पर आधारित होता है, जिसमें विशेष रूप से ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति को ध्यान में रखा जाता है। मुख्य रूप से यह मेला तब आयोजित होता है जब: सूर्य और बृहस्पति मकर राशी में होते हैं।

वहीं, चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति एक विशिष्ट ज्योतिषीय स्थिति में होते हैं, जिसे 'महा योग' कहा जाता है। कुंभ मेला उन स्थानों पर आयोजित होता है जहां इन ग्रहों और नक्षत्रों का संगम एक विशेष ज्योतिषीय संयोग बनाता है। इस आधार पर, कुंभ मेला हर 12 साल में एक बार आयोजित होता है, लेकिन यह स्थिति केवल महाकुंभ मेला के लिए होती है, बाकी कुंभ मेलों का आयोजन हर 3 साल में किया जाता है।

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