Womens' Day 2025: बेटियों का पिता की संपत्ति में अधिकार

नई दिल्ली: पिता की संपत्ति में बेटियों का अधिकार, भारतीय समाज में एक लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। पहले, समाज में यह धारणा रही कि केवल बेटे ही पिता की संपत्ति के वारिस होते हैं, जबकि बेटियाँ इस अधिकार से वंचित रहती थीं। लेकिन साल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया गया, जिसने बेटियों को अपने पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार प्रदान किया।

हिंदू उत्तराधिकार कानून

साल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन ने बेटियों को पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार दिया। इसके तहत बेटियाँ न केवल पिता की संपत्ति की सह-स्वामी बनती हैं, बल्कि उन्हें समान अधिकार प्राप्त होता है जैसे कि उनके भाई को मिलता है। इस संशोधन ने पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के अधिकार को बल दिया और उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता के रास्ते खोलने में मदद की।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

सुप्रीम कोर्ट का 11 अगस्त 2020 का फैसला, विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा के मामले में, एक ऐतिहासिक कदम था। इस निर्णय में न्यायालय ने कहा कि बेटी को जन्म से ही अपने पिता की पैतृक संपत्ति में अधिकार होता है, चाहे वह शादीशुदा हो या अविवाहित। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी पिता की मृत्यु हो जाती है, तो बेटी को संपत्ति में अधिकार मिलना बंद नहीं होता, और शादी के बाद भी वह अपने अधिकार का उपयोग कर सकती है।

बेटियों के अधिकार: संपत्ति पर नियंत्रण

बेटियाँ अब न केवल अपनी हिस्सेदारी का दावा कर सकती हैं, बल्कि अपनी हिस्सेदारी को बेचने, दान करने या बंटवारे की मांग भी कर सकती हैं। इसका मतलब यह है कि अगर बेटी चाहती है, तो वह अपनी संपत्ति को स्वतंत्र रूप से प्रबंधित कर सकती है, जैसे कि कोई भी अन्य मालिक अपनी संपत्ति पर अधिकार करता है। यह बदलाव न केवल बेटी के अधिकार को सुनिश्चित करता है, बल्कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

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