सरकार ने मांगा समय, कोर्ट ने दी अगली तारीख
सरकार ने अदालत को बताया कि इस मुद्दे पर ठोस निर्णय लेने और नीति तैयार करने में लगभग दो महीने का समय लग सकता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के बयान को रिकॉर्ड में लेते हुए अगली सुनवाई 28 जुलाई 2026 तक के लिए टाल दी है।
कहां से शुरू हुआ मामला
यह मामला फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा वर्ष 2021 में दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में मांग की गई थी कि दवा कंपनियों की मार्केटिंग से जुड़े नियमों को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और मरीजों का हित सुरक्षित रहे।
डॉक्टरों को लुभाने के आरोप
याचिका में आरोप लगाया गया है कि कई दवा कंपनियां डॉक्टरों को महंगे गिफ्ट, स्पॉन्सर्ड विदेश यात्राएं और अन्य लाभ देकर अपनी दवाएं लिखवाने के लिए प्रेरित करती हैं। इससे मरीजों को अक्सर महंगी दवाएं दी जाती हैं, जबकि सस्ते विकल्प भी उपलब्ध होते हैं।
जेनेरिक दवाओं पर जोर
पहले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि डॉक्टरों को प्रिस्क्रिप्शन में जेनेरिक दवाएं लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे मरीजों का खर्च कम होगा और स्वास्थ्य सेवाएं अधिक सुलभ बनेंगी।
नियम तो हैं, लेकिन सख्ती नहीं
सरकार ने पहले ही 'यूनिफॉर्म कोड ऑफ फार्मास्यूटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज' बनाया हुआ है, जिसमें साफ तौर पर कंपनियों को डॉक्टरों को उपहार या अन्य लाभ देने से रोका गया है। लेकिन यह कोड अभी तक कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, जिसके कारण इसका प्रभाव सीमित है।

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