प्रशासक व्यवस्था पर उठे सवाल
ग्राम प्रधानों ने कोरोना काल का हवाला देते हुए कहा कि उस समय चुनाव संभव नहीं होने पर सरकारी अधिकारियों को पंचायतों का प्रशासक बनाया गया था। हालांकि, उस दौरान कई जगह वित्तीय अनियमितताओं और ग्रामीण समस्याओं की अनदेखी के आरोप सामने आए थे। इसी अनुभव के आधार पर प्रधानों ने इस बार वैसी व्यवस्था से बचने की मांग की है।
बैठक में लिया गया अहम निर्णय
इस मुद्दे को लेकर बैरिया ब्लॉक परिसर में ग्राम प्रधानों की एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक में सर्वसम्मति से तय किया गया कि सरकार से कार्यकाल बढ़ाने की औपचारिक मांग की जाएगी। साथ ही, जरूरत पड़ने पर आंदोलन का रास्ता अपनाने की चेतावनी भी दी गई।
अन्य राज्यों का दिया उदाहरण
ग्राम प्रधानों ने अपनी मांग को मजबूत करने के लिए उत्तराखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों का उदाहरण दिया, जहां विशेष परिस्थितियों में पंचायतों का कार्यकाल बढ़ाया गया है। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह का फैसला लिया जाना चाहिए।
ग्रामीण विकास पर पड़ सकता है असर
प्रधानों का तर्क है कि यदि प्रशासनिक अधिकारियों को पंचायतों का कार्यभार सौंपा जाता है, तो जमीनी स्तर पर विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं। स्थानीय प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति में ग्रामीण समस्याओं के समाधान में देरी हो सकती है।
अब राज्य सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह चुनाव समय पर कराए या फिर कार्यकाल बढ़ाने पर विचार करे। दोनों ही विकल्पों के अपने-अपने प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभाव हो सकते हैं।

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