होर्मुज संकट और भारत की चुनौती
भारत अपनी कुल जरूरत का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से आयात करता रहा है। लेकिन हालिया घटनाओं के बाद इस रूट पर जोखिम बढ़ गया, जिससे देश में पेट्रोल-डीजल की कमी और कीमतों में उछाल का खतरा बन गया था। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सप्लाई को बिना रुकावट जारी रखना।
रूस बना बड़ा सप्लायर
इस संकट के दौरान रूस भारत के लिए सबसे अहम साझेदार बनकर उभरा। भारत ने रूसी तेल का आयात तेजी से बढ़ाया, जिससे घरेलू जरूरतों को पूरा करने में मदद मिली। कम कीमत और उपलब्धता के कारण भारतीय रिफाइनरियों ने इसका पूरा फायदा उठाया।
अफ्रीका और अन्य देश
भारत ने केवल एक देश पर निर्भर रहने के बजाय अपने विकल्पों का दायरा बढ़ाया। अंगोला और नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी देशों से आयात बढ़ाया गया। साथ ही ईरान और वेनेजुएला से भी तेल मंगाने की दिशा में कदम उठाए गए। यह रणनीति भारत की 'डायवर्सिफिकेशन' नीति को दर्शाती है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो सके।
कीमतों का दबाव बना रहेगा
हालांकि सप्लाई सुनिश्चित हो गई है, लेकिन कीमतों का संकट पूरी तरह टला नहीं है। वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने से भारत को भी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। फिलहाल सरकार टैक्स में राहत देकर आम लोगों पर असर कम करने की कोशिश कर रही है, लेकिन आने वाले समय में कीमतों में बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया जा सकता।

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