भारत की बड़ी तैयारी: अब डॉलर नहीं, अपनी करेंसी में होगा सौदा

नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत अपनी आर्थिक रणनीति में बड़ा बदलाव करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सरकार अब खाड़ी देशों के साथ व्यापार को अमेरिकी डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं में करने की योजना पर काम कर रही है। इस कदम का उद्देश्य न केवल आयात लागत को कम करना है, बल्कि बाहरी आर्थिक झटकों से भी बचाव करना है।

क्या है नई रणनीति?

सरकार की योजना है कि तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं के आयात के लिए डॉलर पर निर्भरता कम की जाए। इसके लिए भारत और खाड़ी देश आपसी व्यापार में अपनी-अपनी करेंसी का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस व्यवस्था से डॉलर में लेनदेन के दौरान होने वाले अतिरिक्त खर्च और विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।

खाड़ी देशों की भूमिका

यह पहल मुख्य रूप से Gulf Cooperation Council के देशों के साथ लागू हो सकती है। इसमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, ओमान और बहरीन जैसे देश शामिल हैं। भारत के कुल कच्चे तेल आयात का बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों से आता है, इसलिए इनसे स्थानीय मुद्रा में व्यापार शुरू करना रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।

क्यों जरूरी है यह कदम?

भारत अपनी लगभग 85% तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बदलाव सीधे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। जब कीमतें बढ़ती हैं या रुपया कमजोर होता है, तो आयात बिल और महंगाई दोनों बढ़ जाते हैं। स्थानीय मुद्रा में व्यापार से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है।

UAE मॉडल से मिली दिशा

भारत इस दिशा में पहले ही संयुक्त अरब अमीरात के साथ एक सफल मॉडल लागू कर चुका है। दोनों देशों के बीच लोकल करेंसी सेटलमेंट व्यवस्था शुरू होने के बाद व्यापार सीधे रुपये और दिरहम में किया जा रहा है। इससे लेनदेन की लागत कम हुई है और डॉलर पर निर्भरता घटाने में मदद मिली है।

आगे क्या है योजना?

सरकार अब इसी मॉडल को अन्य खाड़ी देशों तक विस्तार देने की तैयारी कर रही है। साथ ही प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) वार्ताओं के दौरान भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जाएगा। हालांकि, वेस्ट एशिया में जारी तनाव के कारण इस दिशा में औपचारिक बातचीत 2026 के दूसरे हिस्से में शुरू होने की संभावना है।

अगर यह योजना सफल होती है, तो भारत की अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली में बड़ा बदलाव आ सकता है। इससे न केवल डॉलर पर निर्भरता कम होगी, बल्कि रुपये की वैश्विक स्वीकार्यता भी बढ़ेगी। साथ ही, देश को आयात लागत में कमी और आर्थिक झटकों से बेहतर सुरक्षा मिल सकती है।

0 comments:

Post a Comment