ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदला रणनीतिक दृष्टिकोण
पिछले वर्ष हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारतीय वायु रक्षा क्षमताओं ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। चार दिनों तक चले संघर्ष में S-400 प्रणाली ने लंबी दूरी से कई दुश्मन विमानों को निशाना बनाकर अपनी मारक क्षमता का प्रदर्शन किया। बताया जाता है कि 300 किलोमीटर से अधिक दूरी पर लक्ष्य भेदने की क्षमता ने इसे सामरिक बढ़त दिलाई। इस ऑपरेशन ने भारतीय सुरक्षा ढांचे में लंबी दूरी की मिसाइल रक्षा प्रणालियों की आवश्यकता को और रेखांकित किया।
पूर्वी और पश्चिमी मोर्चे पर तैनाती की योजना
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अतिरिक्त स्क्वाड्रनों को देश के पूर्वी और पश्चिमी दोनों सीमांत क्षेत्रों में तैनात करने की योजना है। चीन और पाकिस्तान से संभावित हवाई खतरों को ध्यान में रखते हुए दो-फ्रंट पर तैयार रहना भारत की प्राथमिकता बन गया है। ऐसे में लंबी दूरी की, बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली सामरिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
खरीद को लेकर रूस के साथ जारी वार्ता
भारत और रूस के बीच 2018 में पांच S-400 स्क्वाड्रन की खरीद का समझौता हुआ था। इनमें से तीन प्रणालियाँ पहले ही भारतीय वायु सेना में शामिल होकर परिचालन में आ चुकी हैं, जबकि शेष दो की आपूर्ति प्रक्रिया जारी है। अब अतिरिक्त पांच स्क्वाड्रन के प्रस्ताव पर दोनों देशों के बीच प्रारंभिक स्तर पर बातचीत चल रही है। रक्षा मंत्रालय जल्द ही इस संबंध में औपचारिक निर्णय ले सकता है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य और तकनीकी तुलना
हाल के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों ने आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों की वास्तविक क्षमता को परखा है। कुछ देशों की प्रणालियाँ अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकीं, जबकि S-400 ने विभिन्न परिस्थितियों में अपनी विश्वसनीयता दिखाई है। यह प्रणाली एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक और नष्ट करने की क्षमता रखती है, जिससे यह जेट विमानों, ड्रोन, क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों के खिलाफ प्रभावी मानी जाती है।

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