भारत-जापान की नई साझेदारी: चीन पर पड़ेगा बड़ा असर

नई दिल्ली। दुनिया की रणनीतिक और औद्योगिक राजनीति में रेयर अर्थ मेटल्स की अहमियत लगातार बढ़ती जा रही है। इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर फाइटर जेट और विंड टर्बाइन तक आधुनिक तकनीक का बड़ा हिस्सा इन खनिजों पर निर्भर है। अब भारत और जापान के बीच उभरती नई साझेदारी इस वैश्विक समीकरण को बदल सकती है, खासकर तब जब अधिकतर देश लंबे समय से चीन पर निर्भर रहे हैं।

चीन की पकड़ और बदलता वैश्विक परिदृश्य

कई वर्षों तक रेयर अर्थ मेटल्स की सप्लाई में चीन का दबदबा रहा है। 2025 में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के टैरिफ के जवाब में चीन ने रेयर अर्थ एलिमेंट्स के निर्यात पर सख्त प्रतिबंध लगाए, तब वैश्विक बाजार में हलचल मच गई। इस कदम ने कई देशों को यह एहसास कराया कि एक ही स्रोत पर निर्भरता रणनीतिक जोखिम बन सकती है। इसके बाद अमेरिका, यूरोप, जापान और भारत जैसे देशों ने वैकल्पिक स्रोत खोजने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाने शुरू किए।

राजस्थान में संभावनाएं

भारत ने अपने बजट में रेयर अर्थ कॉरिडोर की अवधारणा रखकर संकेत दे दिया है कि वह इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता चाहता है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, जापान भारत के साथ मिलकर राजस्थान में रेयर अर्थ डिपॉजिट की खोज और विकास को लेकर बातचीत कर रहा है। भारत सरकार के अनुसार, राजस्थान और गुजरात में लगभग 1.29 मिलियन मीट्रिक टन रेयर अर्थ ऑक्साइड वाले तीन हार्ड रॉक डिपॉजिट की पहचान की गई है। ये भंडार भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थिति दिला सकते हैं।

टेक्नोलॉजी और निवेश का समीकरण

हार्ड रॉक डिपॉजिट से रेयर अर्थ निकालना तकनीकी रूप से जटिल और महंगा काम है। इस क्षेत्र में जापान के पास उन्नत तकनीक और प्रोसेसिंग विशेषज्ञता है, जबकि भारत के पास विशाल भू-भंडार और बढ़ता हुआ बाजार है। संभावित समझौते के तहत जापान टेक्नोलॉजी और वित्तीय सहायता दे सकता है, बदले में स्थिर और दीर्घकालिक सप्लाई सुनिश्चित की जा सकती है। यह सहयोग सिर्फ खनन तक सीमित नहीं रहेगा। दोनों देश हाई-प्योरिटी प्रोसेसिंग और मैग्नेट निर्माण जैसी इंडस्ट्रियल फैसिलिटी विकसित करने पर भी काम कर सकते हैं, जिससे चीन से आयात पर निर्भरता घटेगी।

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