बिहार में पुश्तैनी जमीन पर बेटियों का अधिकार, क्या कहता है कानून?

पटना। बिहार में लंबे समय तक यह धारणा रही कि पुश्तैनी जमीन पर केवल बेटों का अधिकार होता है। लेकिन बदलते कानून और न्यायालयों के फैसलों ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। आज बेटियां भी संपत्ति में बराबर की हकदार हैं और उन्हें कानूनी रूप से वही अधिकार प्राप्त हैं जो बेटों को मिलते हैं।

क्या है कानूनी स्थिति?

भारत में पुश्तैनी संपत्ति के अधिकार को लेकर सबसे बड़ा बदलाव हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के जरिए आया। इस कानून के तहत बेटियों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में समान अधिकार दिया गया है। इसका मतलब है कि अब बेटियां भी “कॉपार्सनर” (सह-स्वामी) मानी जाती हैं और उन्हें बेटे के बराबर हिस्सा मिलता है।

बिहार में कैसे लागू होता है यह नियम?

बिहार में भी यही केंद्रीय कानून लागू होता है। यानी अगर परिवार हिंदू उत्तराधिकार कानून के दायरे में आता है, तो बेटी को पुश्तैनी जमीन में बराबर का हिस्सा मिलेगा। चाहे बेटी शादीशुदा हो या अविवाहित, उसके अधिकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई महत्वपूर्ण फैसलों में स्पष्ट किया है कि बेटी को संपत्ति में अधिकार पाने के लिए यह जरूरी नहीं है कि पिता जीवित हो। उसे जन्म से ही यह अधिकार प्राप्त है। इस फैसले के बाद बेटियों के हक को और मजबूत आधार मिला है।

किन मामलों में नहीं मिलेगा अधिकार?

हालांकि कुछ परिस्थितियों में यह अधिकार सीमित हो सकता है—

अगर संपत्ति का बंटवारा 20 दिसंबर 2004 से पहले हो चुका है

या फिर कोई वैध वसीयत (Will) बनाई गई हो

अन्य धर्मों (मुस्लिम आदि) में अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू होते हैं

जमीन विवाद कम करने में मदद

कानून का उद्देश्य परिवार में बराबरी और न्याय सुनिश्चित करना है। इससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और जमीन से जुड़े विवाद भी कम होने की उम्मीद रहती है।

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