दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) के माध्यम से टीआरई-1, टीआरई-2 और टीआरई-3 के तहत हजारों शिक्षकों की नियुक्ति की गई थी। इन भर्तियों के तहत करीब चार हजार से अधिक उम्मीदवारों को शिक्षक पद मिला था। अब इन सभी की शैक्षणिक योग्यता और प्रमाण पत्रों की दोबारा जांच की जा रही है।
जांच में सामने आया बड़ा खेल
प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि कुछ उम्मीदवारों ने फर्जी सर्टिफिकेट के आधार पर नौकरी हासिल की। यह मामला केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक संगठित नेटवर्क के सक्रिय होने की आशंका जताई जा रही है। माना जा रहा है कि तथाकथित शिक्षा माफिया इस पूरे खेल को संचालित कर रहा था, जिसकी पकड़ सिस्टम के ऊपरी स्तर तक हो सकती है।
पहले भी हो चुके हैं ऐसे मामले
यह पहली बार नहीं है जब बिहार में शिक्षक भर्ती में गड़बड़ी सामने आई हो। वर्ष 2012 से 2015 के बीच “पहले आओ, पहले पाओ” के आधार पर हुई नियुक्तियों में भी बड़ी संख्या में फर्जी शिक्षक पकड़े गए थे। उस दौरान कई नियुक्तियां रद्द की गई थीं और संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी हुई थी।
सख्त कार्रवाई की तैयारी
वर्तमान स्थिति को देखते हुए शिक्षा विभाग अब कोई ढील देने के मूड में नहीं है। जिन शिक्षकों के दस्तावेज जांच में फर्जी पाए जाएंगे, उनकी नौकरी समाप्त की जा सकती है। इसके अलावा, संबंधित अभ्यर्थियों पर कानूनी कार्रवाई भी तय मानी जा रही है।
पारदर्शिता पर जोर
सरकार का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसी कारण सभी नियुक्त शिक्षकों के प्रमाण पत्रों का वेरिफिकेशन तेज कर दिया गया है, ताकि योग्य उम्मीदवारों के साथ किसी तरह का अन्याय न हो।
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