भवानीपुर में ममता और शुभेंदु के बीच कांटे की टक्कर? सर्वे ने बढ़ाई सियासी धड़कनें

कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भवानीपुर सीट का समीकरण इस बार और भी पेचीदा बन गया है। यह वही सीट है जिसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लंबे समय से अपना राजनीतिक गढ़ मानती रही हैं। अब उनके और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के बीच मुकाबला बेहद करीबी और रोमांचक होने वाला है।

2021 के चुनावों में बनर्जी ने नंदीग्राम में पार्टी के पूर्व सहयोगी से चुनौती पाई थी और हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन भवानीपुर उपचुनाव में उन्होंने अपनी जीत से अपने गढ़ को फिर से मजबूत किया। इस बार मैदान बदल चुका है और भाजपा ने सीट पर रणनीति को और कड़ा कर दिया है।

टीएमसी की रणनीति: भावनात्मक जुड़ाव और स्थानीय शक्ति

टीएमसी इस चुनाव में भावनात्मक अपील पर भरोसा कर रही है। पार्टी ने संगठनात्मक ताकत के साथ घर-घर पहुंच अभियान चलाया है। पार्षदों को कहा गया है कि वे बनर्जी के विकास कार्यों और उनके व्यक्तिगत जुड़ाव को मतदाताओं तक पहुंचाएं। इसके अलावा ‘फोटो कॉर्नर’ बनाकर मतदाताओं को मुख्यमंत्री के साथ तस्वीर खिंचवाने का मौका भी दिया जा रहा है।

भाजपा की रणनीति: सामाजिक समीकरण और वोट विभाजन

भाजपा इस सीट पर सामाजिक गणित और प्रतीकवाद के आधार पर सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। भवानीपुर में बंगाली हिंदू, गैर-बंगाली हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं का मिश्रित समाज है। भाजपा का लक्ष्य हिंदू वोटों को एकजुट करना और अल्पसंख्यक मतदाताओं के समर्थन को संतुलित करना है। पार्टी ने हर बूथ और समुदाय के हिसाब से रणनीति बनाई है।

मतदाता सूची और चुनौती, क्या कहता है सर्वे

भवानीपुर की मतदाता सूची में हालिया समय में काफी बदलाव हुए हैं। पिछले चुनावों की तुलना में लगभग 47,000 नाम हटा दिए गए हैं। यह बदलाव चुनाव के परिणाम पर सीधे असर डाल सकता है। कई सर्वे और पोल ये दिखाते हैं इस सीट पर ममता बनर्जी के लिए जीत हासिल करना आसान नहीं रहने वाला हैं।

मुकाबला बेहद टाइट

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भवानीपुर अब वह अभेद्य किला नहीं रहा, जैसा पहले माना जाता था। भाजपा और टीएमसी दोनों ही इस सीट पर अपनी ताकत आजमा रहे हैं। टीएमसी अपने भावनात्मक जुड़ाव और संगठनात्मक ताकत पर भरोसा कर रही है, जबकि भाजपा अपने सामाजिक समीकरण और रणनीतिक बूथ अभियान के जरिए चुनौती पेश कर रही है।

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