अमेरिका ने बदला रुख
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट किया है कि समुद्र में मौजूद रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद के लिए दी गई छूट अब आगे बढ़ाने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका का लक्ष्य प्रतिबंधों को और सख्त करना है, ताकि इन देशों की तेल निर्यात क्षमता पर असर डाला जा सके। वहीं, ईरान को लेकर भी अमेरिका ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि वहां से किसी भी प्रकार के तेल निर्यात को अनुमति नहीं दी जाएगी। अमेरिका का दावा है कि ईरानी तेल पर लगभग पूरी तरह से रोक लग चुकी है।
ऊर्जा बाजार में बढ़ी हलचल
यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया पहले से ही मध्य पूर्व में तनाव और युद्ध जैसी स्थिति के कारण ऊर्जा संकट की आशंका से जूझ रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी चिंताएं बनी हुई हैं, क्योंकि यह वैश्विक तेल आपूर्ति का एक अहम मार्ग है। जानकारों के अनुसार, अगर कड़े प्रतिबंध लागू होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें फिर से तेज़ी से बढ़ सकती हैं।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में रूसी तेल पर छूट खत्म होने या प्रतिबंध सख्त होने से भारत की आयात रणनीति पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि भारत पहले से ही कई देशों से विविध स्रोतों के जरिए तेल खरीद रहा है, जिससे कुछ हद तक संतुलन बना हुआ है।
चीन की स्थिति भी है चुनौतीपूर्ण
चीन भी दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक है। अमेरिका के इस सख्त रुख से चीन की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि दोनों देश वैकल्पिक स्रोतों और दीर्घकालिक समझौतों पर काम कर रहे हैं।

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