इस पहल के लिए अररिया, मधेपुरा, कटिहार, सहरसा, सुपौल और पूर्णिया के कृषि विज्ञान केंद्रों का चयन किया गया है। ये केंद्र बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर से जुड़े हैं। यहां किसानों को मखाना की सफाई, गुणवत्ता सुधार, प्रोसेसिंग और पैकेजिंग जैसी सुविधाएं स्थानीय स्तर पर मिल सकेंगी।
कच्चा मखाना बेचने की मजबूरी होगी कम
प्रोसेसिंग की सुविधा मिलने से किसानों को केवल कच्चा मखाना बेचने पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। तैयार और मूल्यवर्धित उत्पाद के जरिए बाजार में बेहतर कीमत हासिल करने के अवसर बढ़ सकते हैं। इससे खेत से बाजार तक मखाना की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
युवाओं को मिलेगा प्रशिक्षण
आपको बता दें की कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों और ग्रामीण युवाओं को मखाना प्रोसेसिंग की तकनीक की ट्रेनिंग भी दी जाएगी। इसमें गुणवत्ता बनाए रखने, स्वच्छता, पैकेजिंग और छोटे कृषि उद्यम शुरू करने से जुड़ी जानकारी दी जाएगी।
मखाना उत्पादन को बिहार की प्रमुख कृषि गतिविधियों में से एक माना जाता है। प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन की सुविधाएं बढ़ने से स्थानीय स्तर पर रोजगार और छोटे कारोबार के नए अवसर बनने की उम्मीद है। साथ ही किसानों को अपने उत्पाद का बेहतर बाजार और दाम मिलने का रास्ता भी आसान हो सकता है।
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