चार साल में 1,600 फीसदी से ज्यादा उछाल
रक्षा व्यापार के आंकड़ों के मुताबिक, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद मध्य और पूर्वी यूरोप के 13 देशों को भारत से गोला-बारूद और संबंधित सामग्री की आपूर्ति में भारी बढ़ोतरी हुई। पहले जिन देशों को भारतीय रक्षा सामग्री की सीमित आपूर्ति होती थी, वहां अब भारतीय कंपनियों की भूमिका बढ़ी है। इस खास श्रेणी में भारत दूसरे बड़े आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हुआ है। हालांकि, यह रैंकिंग पूरे यूरोप के सभी हथियारों के कारोबार की नहीं, बल्कि संबंधित देशों और उत्पादों की एक विशेष श्रेणी की है।
भारत का कुल रक्षा निर्यात भी तेजी से बढ़ रहा है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में देश का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जबकि 2024-25 में यह 23,622 करोड़ रुपये था। यानी एक साल में करीब 62.7 फीसदी की वृद्धि हुई। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता और विदेशी बाजारों में पहुंच लगातार बढ़ रही है।
ब्रह्मोस मिसाइल की विदेशों में बढ़ती मांग
भारत के रक्षा निर्यात की चर्चा में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सबसे प्रमुख उत्पादों में शामिल है। जनवरी 2022 में फिलीपींस ने भारत के साथ करीब 375 मिलियन डॉलर यानी लगभग 3,100 करोड़ रुपये का समझौता किया था। अप्रैल 2024 में मिसाइल की पहली खेप फिलीपींस को सौंपी गई। इस समझौते ने भारत के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया के रक्षा बाजार में नए रास्ते खोले।
ब्रह्मोस के अलावा तेजस लड़ाकू विमान और आकाश मिसाइल प्रणाली जैसे स्वदेशी रक्षा उत्पाद भी विदेशी खरीदारों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। हालांकि, किसी देश की दिलचस्पी और वास्तविक खरीद समझौते में अंतर होता है। इसलिए भारत की निर्यात क्षमता का आकलन करते समय पक्के सौदों और संभावित प्रस्तावों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
भारत के हथियारों की मांग क्यों बढ़ रही है?
भारतीय रक्षा उद्योग को प्रतिस्पर्धी कीमत, घरेलू उत्पादन और तकनीकी क्षमता से फायदा मिल रहा है। पहले जिन रक्षा उपकरणों के लिए भारत दूसरे देशों पर निर्भर था, अब उनमें से कई का उत्पादन देश में हो रहा है। सरकारी कंपनियों के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ी है, जिससे उत्पादन और निर्यात की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।
वित्त वर्ष 2025-26 में सरकारी रक्षा कंपनियों ने 21,071 करोड़ रुपये और निजी क्षेत्र ने 17,353 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात किया। इससे साफ है कि इस क्षेत्र में निजी कंपनियां भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
आगे भारत के लिए कितनी बड़ी है चुनौती?
वैश्विक हथियार बाजार में जगह बनाना केवल कम कीमत पर उत्पाद बेचने तक सीमित नहीं है। समय पर आपूर्ति, हथियारों की गुणवत्ता, तकनीकी सहायता और लंबे समय तक रखरखाव की सुविधा भी अहम होती है। भारत के सामने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने और विदेशी खरीदारों का भरोसा बनाए रखने की चुनौती है।
फिलहाल रक्षा निर्यात में बढ़ोतरी भारत की बदलती भूमिका का संकेत है। अगर देश इसी तरह स्वदेशी तकनीक, उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी पर काम करता रहा, तो आने वाले वर्षों में भारतीय रक्षा उद्योग वैश्विक बाजार में और मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है।

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