पंचकोश सिद्धांत पर आधारित नया ढांचा
इस पाठ्यक्रम की खासियत यह है कि इसे भारतीय ज्ञान परंपरा के पंचकोश सिद्धांत से जोड़ा गया है। बच्चों के विकास को पांच प्रमुख आयामों में विभाजित किया गया है:
अन्नमय कोष → शारीरिक विकास
प्राणमय कोष → सामाजिक, भावनात्मक और नैतिक विकास
मनोमय कोष → भाषा और साक्षरता
विज्ञानमय कोष → संज्ञानात्मक (सोचने-समझने) की क्षमता
आनंदमय कोष → कला, सौंदर्यबोध और रचनात्मकता
इस मॉडल के जरिए बच्चों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास को संतुलित रूप से आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
खेल-खेल में सीखने पर जोर
नए पाठ्यक्रम में पारंपरिक रटने की पद्धति से हटकर खेल, कहानी, संवाद और समूह गतिविधियों के जरिए सीखने पर जोर दिया गया है। इससे बच्चे सीखने को बोझ नहीं बल्कि एक रोचक अनुभव के रूप में देखेंगे।
नई किताबें और सामग्री तैयार
राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) ने इस पाठ्यक्रम के लिए खास शिक्षण सामग्री तैयार की है। इनमें शामिल हैं चहक, कदम और कलांकुर नाम की वर्कबुक, गतिविधि आधारित पुस्तिकाएं, चित्र कथाएं और संख्या ज्ञान सामग्री, कला और संगीत से जुड़ी शिक्षण सामग्री। इन संसाधनों के माध्यम से बच्चों को बहुआयामी तरीके से सीखने का अवसर मिलेगा।
क्यों है यह बदलाव जरूरी?
विशेषज्ञों का मानना है कि 3 से 6 वर्ष की उम्र बच्चों के विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है। इसी समय उनकी सोच, भाषा, व्यवहार और रचनात्मकता की नींव पड़ती है। इसलिए इस नए पाठ्यक्रम में अनुभव आधारित शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया है, ताकि बच्चे केवल किताबों से नहीं बल्कि गतिविधियों के जरिए सीख सकें।

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