रिपोर्ट के मुताबिक स्मार्टफोन निर्यात में बढ़ोतरी से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है। आने वाले समय में अगर यही रफ्तार बनी रहती है, तो भारत वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में और बड़ी भूमिका निभा सकता है। यह बदलाव न केवल भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में भी नई दिशा का संकेत देता है।
क्यों बदल रहा है अमेरिका का रुख?
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने आयात के स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई है। पहले जहां बड़ी मात्रा में सामान चीन से आता था, अब उसी का बड़ा हिस्सा अन्य देशों से मंगाया जा रहा है। अनुमान है कि लगभग 80 अरब डॉलर के सामान की आपूर्ति अब चीन के बजाय दूसरे देशों के जरिए हो रही है।
भारत बना उभरता मैन्युफैक्चरिंग हब
इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा भारत को मिला है। खासकर स्मार्टफोन सेक्टर में भारत ने तेजी से अपनी पकड़ मजबूत की है। उत्पादन बढ़ने और वैश्विक कंपनियों के निवेश के चलते भारत अब एक प्रमुख निर्माण केंद्र के रूप में उभर रहा है। इससे न केवल निर्यात बढ़ा है, बल्कि रोजगार और औद्योगिक विकास को भी गति मिली है।
एशिया में बदला मैन्युफैक्चरिंग का नक्शा
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने भी इस बदलाव का लाभ उठाया है। लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के निर्यात में इन देशों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। वे चीन से कच्चा माल लेकर तैयार उत्पाद अमेरिका भेज रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय उत्पादन नेटवर्क मजबूत हुआ है।
नई वैश्विक नीति से चीन को हो रहा नुकसान?
अमेरिका की नई व्यापार नीति और सप्लाई चेन में बदलाव के कारण चीन की हिस्सेदारी धीरे-धीरे घट रही है। इससे चीन के पारंपरिक निर्यात क्षेत्रों पर असर पड़ा है। हालांकि चीन अभी भी एक बड़ा खिलाड़ी बना हुआ है, लेकिन उसकी पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रही।

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