केंद्र सरकार का बड़ा कदम, सभी राज्यों के लिए नए निर्देश

नई दिल्ली। भारत की कृषि नीति में एक बड़ा बदलाव धीरे-धीरे आकार ले रहा है। केंद्र सरकार ने राज्यों को जो सलाह दी है कि वे अपनी बोनस नीति को दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों के पक्ष में ढालें। वह केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि खेती के भविष्य को दिशा देने की कोशिश है।

गेहूं-धान पर निर्भरता क्यों चिंता का विषय है?

पिछले कई दशकों में, खासकर उत्तर भारत में, खेती का पैटर्न गेहूं और धान के इर्द-गिर्द सिमट गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि इन फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के साथ-साथ कई राज्यों द्वारा अतिरिक्त बोनस भी दिया जाता है। इससे किसानों को आर्थिक सुरक्षा तो मिलती है, लेकिन वे अन्य फसलों की ओर जाने से हिचकते हैं।

इसका नतीजा यह हुआ कि: दालों और तिलहनों का उत्पादन अपेक्षाकृत कम रहा, भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ (विशेषकर धान की खेती में), रासायनिक उर्वरकों के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हुई, यानी अल्पकालिक लाभ के लिए अपनाई गई यह रणनीति दीर्घकाल में पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए चुनौती बन गई।

फसल विविधीकरण: समाधान की दिशा

केंद्र सरकार अब 'फसल विविधीकरण' को बढ़ावा देना चाहती है। इसका मतलब है कि किसान गेहूं-धान के साथ-साथ दालें, तिलहन और मोटे अनाज (जैसे बाजरा, ज्वार) भी उगाएं।

अब तक के प्रयास और उनके परिणाम

सरकार ने पहले भी कई योजनाओं के जरिए इस दिशा में काम किया है: PM-KISAN के तहत करोड़ों किसानों को सीधे आर्थिक सहायता, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से मौसम संबंधी जोखिमों से सुरक्षा, सॉइल हेल्थ कार्ड के जरिए मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने की पहल, राष्ट्रीय खाद्य तेल-तिलहन मिशन और पाम ऑयल मिशन से उत्पादन में बढ़ोतरी, मेगा फूड पार्कों का विस्तार, जिससे फसल के बाद होने वाले नुकसान में कमी। इन प्रयासों के कारण तिलहन उत्पादन और क्षेत्रफल दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, और आयात निर्भरता भी धीरे-धीरे कम हो रही है।

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