यूपी में शिक्षकों के लिए बड़ा अपडेट, ब्रिज कोर्स अनिवार्य

लखनऊ। उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में बेसिक शिक्षा परिषद के अंतर्गत कार्यरत बीएड प्रशिक्षित शिक्षकों के लिए एक महत्वपूर्ण अपडेट सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद अब ऐसे शिक्षकों को छह महीने का ब्रिज कोर्स करना अनिवार्य कर दिया गया है। इस फैसले का उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को और मजबूत करना बताया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुई प्रक्रिया

यह मामला उस समय शुरू हुआ जब प्राथमिक विद्यालयों में बीएड और डीएलएड योग्यता को लेकर विवाद सामने आया। इस पर अलग-अलग उच्च न्यायालयों में सुनवाई हुई और अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 से 2023 के बीच प्राथमिक विद्यालयों में नियुक्त बीएड प्रशिक्षित शिक्षकों के लिए स्पष्ट निर्देश जारी किए कि उन्हें शिक्षा प्रणाली में बने रहने के लिए छह महीने का ब्रिज कोर्स पूरा करना होगा।

NIOS ने खोला पोर्टल

कोर्ट के आदेश के अनुपालन में राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) ने इस प्रशिक्षण प्रक्रिया को लागू करने की जिम्मेदारी संभाली। NIOS ने 23 नवंबर 2025 को ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया, जिसके माध्यम से शिक्षकों का पंजीकरण कराया गया। इस प्रक्रिया के लिए कई बार अंतिम तिथि बढ़ाई गई ताकि सभी पात्र शिक्षक आवेदन कर सकें। मार्च 2026 तक देशभर में लगभग 70,000 शिक्षकों ने पंजीकरण कराया, जिनमें से करीब 35,000 शिक्षक अकेले उत्तर प्रदेश से हैं।

ब्रिज कोर्स की खास बातें

इस ब्रिज कोर्स के तहत शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण पद्धति, बाल मनोविज्ञान, कक्षा प्रबंधन और नई शिक्षा नीति से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं की जानकारी दी जाएगी। यह प्रशिक्षण पूरी तरह ऑनलाइन सामग्री और ऑफलाइन सत्रों के मिश्रण पर आधारित होगा। चूंकि अधिकांश शिक्षक स्कूलों में नियमित रूप से पढ़ाते हैं, इसलिए प्रशिक्षण की व्यवस्था इस तरह की जा रही है कि उन्हें परेशानी न हो। इसके लिए ब्लॉक स्तर पर स्कूलों को चिन्हित कर रविवार के दिन विशेष कक्षाएं आयोजित करने की योजना बनाई जा रही है।

परीक्षा और प्रमाणपत्र

छह महीने के प्रशिक्षण के बाद शिक्षकों को परीक्षा देनी होगी। सफल होने पर उन्हें प्रमाणपत्र प्रदान किया जाएगा, जो उनकी सेवा और योग्यता की पुष्टि करेगा। इस पहल से प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होने की उम्मीद जताई जा रही है। सरकार और शिक्षा विभाग का मानना है कि इससे शिक्षकों की दक्षता बढ़ेगी और बच्चों को बेहतर शिक्षण वातावरण मिलेगा।

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