यह कदम सिर्फ जमीन देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इन परिवारों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है। वर्षों से बिना कानूनी अधिकार के रह रहे इन लोगों को अब अपने अधिकारों के साथ जीने का अवसर मिलेगा।
70 साल पुरानी समस्या का समाधान
देश के विभाजन के बाद उत्तर प्रदेश के कई जिलों में शरण लेने वाले इन परिवारों को दशकों से भूमि स्वामित्व नहीं मिल पाया था। इसकी वजह से वे बैंक से ऋण लेने, सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने और अपनी फसल को सरकारी खरीद केंद्रों पर बेचने में असमर्थ थे। अब सरकार के इस फैसले से उनकी सबसे बड़ी समस्या दूर होती नजर आ रही है।
हजारों परिवारों को मिलेगा लाभ
इस निर्णय का प्रभाव सिर्फ 63 परिवारों तक सीमित नहीं है। राज्य के पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, रामपुर और बिजनौर जैसे जिलों में बसे हजारों शरणार्थी परिवारों को भी इसका फायदा मिलेगा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन जिलों में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार रह रहे हैं, जो अब तक स्वामित्व अधिकार के अभाव में आर्थिक रूप से पिछड़े हुए थे।
मालिकाना हक से खुलेगा विकास
वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने बताया कि कैबिनेट ने उन शरणार्थियों को भी जमीन का मालिकाना हक देने का निर्णय लिया है, जिन्हें पहले सिर्फ उपयोग का अधिकार मिला हुआ था। इस बदलाव के बाद वे न केवल बैंक से आसानी से लोन ले सकेंगे, बल्कि अपनी कृषि उपज को सरकारी मंडियों में बेचकर बेहतर आय भी अर्जित कर पाएंगे।
1 एकड़ तक जमीन का अधिकार
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पात्र परिवारों को अधिकतम 1 एकड़ तक जमीन लेने का अधिकार होगा, बशर्ते वह भूमि सीलिंग के दायरे में न आती हो और न ही वह चारागाह, तालाब या अन्य सार्वजनिक उपयोग की जमीन हो। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि विकास के साथ-साथ भूमि संतुलन भी बना रहे।

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