भवानीपुर कोलकाता के दक्षिणी इलाके का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहां बंगाली भद्रलोक के साथ-साथ गुजराती, पंजाबी और हिंदी भाषी समुदाय भी रहते हैं। 2011 के बाद से ममता लगातार यहां जीतती आई हैं, लेकिन हालिया लोकसभा चुनाव में टीएमसी की बढ़त काफी घटकर कुछ हजार वोट तक रह गई। खासकर आठ में से पांच वार्डों में भाजपा आगे रही, जिससे संकेत मिलता है कि राजनीतिक समीकरण अब पहले जैसा नहीं रहा।
डेमोग्राफिक बदलाव और युवा वोटर
भवानीपुर में गैर-बंगाली वोटरों का बड़ा हिस्सा है, जो पिछले चुनावों में पारंपरिक रूप से टीएमसी के खिलाफ रहे हैं। भाजपा ने इन्हें टारगेट किया है, खासकर उन युवा और मोबाइल वोटरों को, जिन्होंने पुराने वोट ब्लॉक्स को कमजोर कर दिया है। सुवेंदु अधिकारी के लिए यह रणनीति काम कर सकती है, क्योंकि उन्होंने पहले ही ममता को नंदीग्राम में हराकर अपनी क्षमता साबित की है।
वोटर लिस्ट में कटौती का असर
भवानीपुर में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान करीब 47,000 नाम हटा दिए गए हैं, जबकि 14,000 से अधिक वोटर ‘अंडर एडजुडिकेशन’ में हैं। यह संख्या 2021 में ममता की जीत के मार्जिन के करीब है। टीएमसी इसे भाजपा की साजिश बता रही है, वहीं भाजपा इसे केवल सटीक और क्लीन वोटर लिस्ट बनाने की प्रक्रिया बता रही है।
ममता के लिए दोगुनी चुनौती
ममता बनर्जी अब सिर्फ विपक्षी उम्मीदवार को हराने की चुनौती नहीं देख रही हैं। बदलते डेमोग्राफिक पैटर्न, मध्य भवानीपुर में बढ़ती भाजपा की पकड़ और वोटर लिस्ट में कटौती उनकी राह में नई बाधाएं हैं। मुस्लिम बहुल वार्डों में टीएमसी की पकड़ मजबूत है, लेकिन बीच के इलाके भाजपा के पक्ष में झुक रहे हैं।
बंगाल की राजनीतिक परीक्षा
भवानीपुर केवल एक सीट नहीं रह गई है; यह बंगाल की राजनीति की सच्चाई को परखने वाला इलाका बन गया है। अगर भाजपा यहां सफल होती है, तो टीएमसी की अजेय छवि को चुनौती मिलेगी। वहीं, ममता की जीत साबित करेगी कि उनका जनाधार अभी भी मजबूत है।
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