12 साल तक चली जांच, फिर हुआ फैसला
इस पूरे मामले की जांच लगभग 12 वर्षों तक चली। शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी, जब तत्कालीन अधिकारियों ने शासन के निर्देश पर संदिग्ध शिक्षकों के दस्तावेजों की जांच शुरू कराई। प्रारंभिक जांच में 31 शिक्षक ऐसे पाए गए थे, जिनके अभिलेख पूरी तरह फर्जी थे। उस समय त्वरित कार्रवाई करते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं। हालांकि, कुछ शिक्षकों ने न्यायालय का रुख किया, जिसके बाद मामले ने नया मोड़ लिया। अप्रैल 2025 में दोबारा जांच के आदेश दिए गए, ताकि पूरी पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट हो सके।
दोबारा जांच में फिर सामने आई सच्चाई
पुनः जांच में भी सात शिक्षक फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी करते पाए गए। इनमें छह की नियुक्ति 2013 और एक महिला शिक्षक की नियुक्ति 2014 की बताई गई। जांच पूरी होने के बाद सितंबर 2025 में फाइल जिला स्तरीय समिति को भेजी गई, जिसकी अध्यक्षता डीएम कर रहे थे। समिति के निर्णय के बाद ही इन शिक्षकों के खिलाफ सेवा समाप्ति की कार्रवाई की गई।
लापरवाही और देरी ने बढ़ाया विवाद
इस मामले में देरी और लापरवाही भी सामने आई। बीएसए कार्यालय के एक लिपिक पर आरोप है कि उसने कार्रवाई से जुड़ी गोपनीय जानकारी लीक की और लंबे समय तक प्रक्रिया को प्रभावित किया। पहले भी उस पर लापरवाही के आरोप लग चुके थे। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, इस पूरे प्रकरण की अलग से जांच कराई जाएगी और दोषी पाए जाने पर संबंधित कर्मियों पर सख्त कार्रवाई होगी।
किन शिक्षकों पर गिरी गाज
जिन शिक्षकों की सेवाएं समाप्त की गई हैं, वे जिले के अलग-अलग प्राथमिक विद्यालयों में तैनात थे। इनमें हरवेंद्र कुमार, शीला देवी, ऊषा देवी, चंद्रकांत, वीरपाल सिंह, विकासचंद्र और सुरेखा शामिल हैं।
शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
इस घटना ने शिक्षा विभाग की भर्ती प्रक्रिया और निगरानी तंत्र पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। इतने लंबे समय तक फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी करना न केवल सिस्टम की कमजोरी को दर्शाता है, बल्कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है।

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