न्यूक्लियर ट्रायड के तीन प्रमुख हिस्से हैं। पहला, जमीन पर तैनात परमाणु-सक्षम मिसाइलें; दूसरा, पनडुब्बियों से दागी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें और तीसरा, परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम लड़ाकू विमान या बॉम्बर। इन तीनों माध्यमों की मौजूदगी से किसी देश की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।
अमेरिका और रूस के पास लंबे समय से तीनों माध्यमों पर आधारित परमाणु क्षमता है। चीन ने भी अपनी जमीन, समुद्र और हवा से जुड़ी परमाणु क्षमताओं का विस्तार किया है। भारत भी न्यूक्लियर ट्रायड विकसित कर चुका है। इसलिए केवल चार देशों के पास यह क्षमता होने का दावा करते समय सावधानी जरूरी है।
भारत की स्थिति क्या है?
भारत ने अपनी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को तीनों माध्यमों से मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। जमीन से परमाणु-सक्षम बैलिस्टिक मिसाइलें, वायुसेना के परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम विमान और समुद्र से परमाणु-सक्षम मिसाइलें दागने वाली परमाणु पनडुब्बियां इसकी रणनीति के अहम हिस्से हैं।
भारत की स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत और उसके बाद विकसित हुई अरिघात जैसी पनडुब्बियां समुद्र आधारित परमाणु क्षमता के विकास में महत्वपूर्ण हैं। समुद्र में तैनात पनडुब्बियों की अहमियत इसलिए भी है कि उनका पता लगाना कठिन हो सकता है, जिससे किसी संभावित हमले के बाद जवाबी कार्रवाई की क्षमता बनी रहती है।
क्यों अहम है न्यूक्लियर ट्रायड?
न्यूक्लियर ट्रायड किसी देश को परमाणु हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई के अधिक विकल्प देता है। जमीन पर मौजूद मिसाइलें, हवा से संचालित विमान और समुद्र में छिपी पनडुब्बियां मिलकर परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को विविध बनाती हैं। हालांकि, इस क्षमता के साथ भारी आर्थिक लागत, तकनीकी चुनौतियां और परमाणु हथियारों से जुड़े वैश्विक जोखिम भी जुड़े हैं।

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