गांव और सरकार बने ग्रोथ के नए इंजन
इस तिमाही की रफ्तार के पीछे सबसे बड़ी भूमिका ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सरकारी खर्च की रही। अच्छी बारिश, बेहतर फसल और ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती मांग ने खपत को मजबूती दी। भारतीय अर्थव्यवस्था का लगभग 60% हिस्सा घरेलू खपत पर आधारित है, और इस बार उपभोक्ताओं ने जमकर खर्च किया। बाजारों में मांग बढ़ी, कारोबारियों को राहत मिली और ग्रामीण उत्पादन ने खपत को निरंतर गति दी।
दूसरी तरफ, सरकार ने भी अपने पूंजीगत व्यय (CapEx) को थामे रखा। सड़क, रेलवे, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे पर बढ़ता खर्च अर्थव्यवस्था को नीचे से सहारा देता रहा। जब निजी कंपनियों ने निवेश धीमा कर दिया, तब सरकारी प्रोजेक्ट अर्थव्यवस्था को टिकाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण सिद्ध हुए।
ट्रंप का टैरिफ: लेकिन आंतरिक ताकत कायम
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय सामानों पर 50% तक टैरिफ बढ़ाने की चेतावनी ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी। इसी के असर में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से भारी पूंजी निकाली। शहरी मांग अभी भी दबाव में है, और निजी क्षेत्र नई परियोजनाएँ शुरू करने में हिचकिचा रहा है। अंतरराष्ट्रीय तनाव और व्यापार पर अनिश्चितता ने कंपनियों को सतर्क बना दिया है।
इसके बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था की “घरेलू मांग आधारित” संरचना ने इसे बड़े झटके से बचाए रखा। यह वही बिंदु है जो चीन और अमेरिका जैसे देशों को आश्चर्य में डाल रहा है कि बाहरी दबावों के बावजूद भारत की आंतरिक ताकत उसकी रफ्तार बनाए रखे हुए है।
भारत दुनिया को क्या संदेश दे रहा है?
कुल मिलाकर, भारत ने दिखाया है कि उसकी आर्थिक ताकत केवल निर्यात या विदेशी निवेश पर निर्भर नहीं है। उसकी असली शक्ति उसकी घरेलू खपत, शक्ति-संपन्न ग्रामीण अर्थव्यवस्था, और सरकार द्वारा आत्मनिर्भर इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण में छिपी है।
यही वजह है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। चीन इस बात से आशंकित है कि भारत उसकी आर्थिक बढ़त को चुनौती दे सकता है, और अमेरिका हैरान है कि भारी टैरिफ दबाव के बावजूद भारत की नींव इतनी मजबूत कैसे है।

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