मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह फैसला खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के सुझाव के बाद लिया जा रहा है। मंत्रालय द्वारा किए गए विश्लेषण में पाया गया कि कम कार्डधारकों वाली दुकानें आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं हैं, जिससे वितरण प्रणाली में गड़बड़ियां और शिकायतें बढ़ रही हैं।
बड़ी संख्या में दुकानें होंगी प्रभावित
सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में ऐसी दुकानों की संख्या काफी अधिक है। कुल मिलाकर करीब 52 हजार से ज्यादा राशन दुकानें इस दायरे में आती हैं, जिनमें ग्रामीण क्षेत्रों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। इसको लेकर अधिकारियों को जमीनी रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि मर्जर प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से लागू किया जा सके।
क्या होगा बदलाव का असर?
सरकार का दावा है कि दुकानों के विलय के बाद भी राशन वितरण में किसी तरह की कमी नहीं आएगी। बल्कि बड़े स्तर पर वितरण होने से निगरानी बेहतर होगी और गड़बड़ियों पर अंकुश लगेगा। हालांकि, जमीनी स्तर पर कुछ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बुजुर्ग, महिलाएं और दिव्यांग लोगों को राशन लेने के लिए अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है।
कोटेदारों को होगा फायदा
जानकारों का मानना है कि छोटी दुकानों पर कम कार्डधारकों के कारण कोटेदारों की आय बेहद सीमित रहती है। इससे कई बार व्यवस्था प्रभावित होती है। मर्जर के बाद एक दुकान पर 1000 से 1500 तक कार्डधारक जुड़ सकते हैं, जिससे कोटेदारों की आय बढ़ेगी और वे बेहतर तरीके से सेवाएं दे पाएंगे।
तकनीक से होगी निगरानी
सरकार अब वितरण व्यवस्था को तकनीकी रूप से मजबूत करने पर भी जोर दे रही है। ‘ई-पॉस’ मशीनों के जरिए राशन वितरण की रियल टाइम मॉनिटरिंग की जाएगी, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और फर्जीवाड़े की संभावना कम होगी।

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