सर्वे ने मचा दी सनसनी: बंगाल में कौन उड़ा ले जाएगा सत्ता—टीएमसी, बीजेपी या लेफ्ट-कांग्रेस?

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की सियासत इस समय अपने चरम पर है। 294 विधानसभा सीटों के लिए 23 और 29 अप्रैल 2026 को मतदान होना है, जबकि 4 मई को नतीजे सामने आएंगे। चुनाव से पहले आए अलग-अलग सर्वे और राजनीतिक आकलन ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। इस बार मुकाबला मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच माना जा रहा है, लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस भी अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश में हैं।

सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी को 148 सीटों का आंकड़ा पार करना होगा। ऐसे में हर सीट की अहमियत बढ़ गई है। हालांकि हाल ही में आई कई सर्वे बताते हैं की बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और बीजेपी के बीच जबरदस्त टक्कर देखने को मिल सकती हैं।

नारे और रणनीति से गरमाया चुनाव

चुनाव से पहले ही राजनीतिक दलों ने अपने-अपने नारों के जरिए माहौल बना दिया है। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी जहां अपने पुराने जनाधार और योजनाओं पर भरोसा जता रही है, वहीं बीजेपी ‘परिवर्तन’ के मुद्दे को केंद्र में रखकर चुनावी अभियान चला रही है। दोनों के बीच सीधी टक्कर की स्थिति बनती दिख रही है।

टीएमसी: मजबूत पकड़, लेकिन एंटी-इनकंबेंसी की चुनौती

टीएमसी पिछले एक दशक से अधिक समय से सत्ता में है और ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। महिलाओं और गरीब वर्ग के लिए चलाई गई योजनाओं ने पार्टी को बड़ा वोट बैंक दिया है। हालांकि, लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण एंटी-इनकंबेंसी और भ्रष्टाचार के आरोप पार्टी के सामने बड़ी चुनौती बन सकते हैं। स्थानीय स्तर पर असंतोष भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है।

बीजेपी: आक्रामक अभियान, लेकिन स्थानीय नेतृत्व की कमी

भारतीय जनता पार्टी ने इस बार चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है और बड़ी जीत का लक्ष्य रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और केंद्रीय मुद्दों को उठाकर पार्टी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है। फिर भी, राज्य स्तर पर मजबूत स्थानीय चेहरों की कमी और ‘बाहरी’ की छवि बीजेपी के लिए बाधा बन सकती है।

वाम दल: वापसी की कोशिश, लेकिन घटता जनाधार और कमजोर संगठनात्मक

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, जिसने 34 वर्षों तक बंगाल पर शासन किया, अब फिर से अपनी जमीन तलाश रही है। हाल के आंदोलनों और मुद्दों के जरिए पार्टी ने अपनी सक्रियता दिखाई है। हालांकि, घटता जनाधार और कमजोर संगठनात्मक ढांचा उसकी राह को मुश्किल बना सकता है।

कांग्रेस: अकेले चुनाव में किस्मत आजमाने का फैसला, लेकिन सीमित संसाधन और कमजोर नेटवर्क

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस बार वाम दलों से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। पार्टी अपने पारंपरिक गढ़ मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया पर भरोसा कर रही है। लेकिन सीमित संसाधन और कमजोर नेटवर्क कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

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