ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के कार्यालय डाउनिंग स्ट्रीट ने पुष्टि की है कि अमेरिकी सेना अब ब्रिटेन के कुछ अहम सैन्य ठिकानों का उपयोग कर सकेगी। इन ठिकानों में आरएएफ फेयरफोर्ड और हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया प्रमुख हैं।
क्यों बदला ब्रिटेन का रुख?
कुछ दिन पहले तक ब्रिटेन इस तरह की सैन्य कार्रवाई से दूरी बनाए हुए था। प्रधानमंत्री स्टार्मर ने स्पष्ट किया था कि किसी भी कदम से पहले कानूनी आधार और संभावित परिणामों का आकलन जरूरी है। लेकिन हालिया घटनाओं खासतौर पर खाड़ी क्षेत्र में हमलों ने ब्रिटेन को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया।
सरकार का कहना है कि यह निर्णय "सामूहिक आत्मरक्षा" के तहत लिया गया है। इसका उद्देश्य उन मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करना है, जिनका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में जहाजों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज जैसे संवेदनशील इलाके में सुरक्षा एक बड़ी चिंता बनी हुई है।
कूटनीतिक दबाव भी बना कारण
इस फैसले के पीछे कूटनीतिक दबाव भी एक अहम वजह माना जा रहा है। हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन को "निराशाजनक सहयोगी" बताते हुए उसकी आलोचना की थी। इसके बाद ब्रिटेन का यह कदम दोनों देशों के बीच सैन्य और रणनीतिक तालमेल को मजबूत करने की दिशा में देखा जा रहा है।
देश के भीतर उठ रहे सवाल
हालांकि, इस फैसले को लेकर ब्रिटेन के अंदर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कई लोग इस तरह के सैन्य सहयोग को बड़े युद्ध की ओर बढ़ता कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे वैश्विक सुरक्षा के लिए जरूरी बता रहे हैं।
संतुलन की कोशिश
दिलचस्प बात यह है कि सैन्य सहयोग देने के साथ-साथ ब्रिटेन ने तनाव कम करने की अपील भी की है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि उसका लक्ष्य युद्ध को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि हालात को नियंत्रित करना और जल्द समाधान की दिशा में प्रयास करना है।

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