अब अपंजीकृत प्रोजेक्ट भी आएंगे दायरे में
नए नियमों के तहत अब वे प्रोजेक्ट भी रेरा के दायरे में आएंगे, जो पहले पंजीकृत नहीं थे। यानी अगर किसी खरीदार ने ऐसी योजना में घर या दुकान खरीदी है, जो रेरा में दर्ज नहीं थी, तो अब वह भी अपनी शिकायत सीधे प्राधिकरण के सामने रख सकता है। इस फैसले से उन हजारों लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो अब तक कब्जा, रिफंड या अन्य अधिकारों के लिए दर-दर भटक रहे थे।
क्या बदला है नियमों में?
संशोधन के जरिए रेरा ने अपने पुराने विनियमों में बदलाव करते हुए स्पष्ट किया है कि अपंजीकृत परियोजनाओं के खरीदार भी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। बता दें की अब ऐसे मामलों की सुनवाई रेरा की बेंच करेगी। पहले यह स्पष्ट नहीं था कि अपंजीकृत प्रोजेक्ट के खरीदार कहां जाएं, अब उन्हें सीधे कानूनी राहत पाने का रास्ता मिल गया है।
शिकायत प्रक्रिया हुई आसान
नए प्रावधानों के तहत खरीदारों को अब अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। शिकायत सीधे रेरा के पोर्टल के जरिए दर्ज की जा सकेगी, मामलों की सुनवाई कर उचित फैसला दिया जाएगा, जरूरत पड़ने पर प्राधिकरण अतिरिक्त जानकारी भी मांग सकता है। यह कदम पूरी प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी और उपभोक्ता-अनुकूल बनाने की दिशा में उठाया गया है।
फीस और ट्रांसफर नियमों में भी बदलाव
नए नियमों में प्रॉपर्टी ट्रांसफर से जुड़े शुल्क को भी तय कर दिया गया है, जिससे मनमानी वसूली पर रोक लगेगी। परिवार के सदस्य को ट्रांसफर पर अधिकतम ₹1,000 प्रोसेसिंग फीस। जबकि अन्य व्यक्ति को ट्रांसफर करने पर अधिकतम ₹25,000 शुल्क। पुराने अनुबंध में संशोधन करके ही ट्रांसफर किया जाएगा, इससे खरीदारों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से राहत मिलेगी।
रेरा की जिम्मेदारी बढ़ी
इस बदलाव के साथ रेरा की भूमिका और भी अहम हो गई है। अब उसे न केवल पंजीकृत, बल्कि अपंजीकृत परियोजनाओं से जुड़े विवाद भी सुलझाने होंगे। जानकारों का मानना है कि इससे रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता बढ़ेगी और प्रमोटरों की जवाबदेही तय होगी।

0 comments:
Post a Comment